श्रीकृष्ण

निसिदिन बरसत नैन हमारे

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर जबते स्याम सिधारे॥

अंजन थिर न रहत अँखियन में कर कपोल भये कारे।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ उर बिच बहत पनारे॥

आँसू सलिल भये पग थाके बहे जात सित तारे।
सूरदास अब डूबत है ब्रज काहे न लेत उबारे॥

अर्थ

रात-दिन हमारी आँखें बरसती रहती हैं। जब से श्याम गए हैं, हम पर सदा वर्षा ऋतु ही बनी रहती है।

आँखों में काजल नहीं टिकता; हाथ और गाल उससे काले हो गए हैं। चोली का कपड़ा कभी सूखता ही नहीं, छाती पर से धाराएँ बहती रहती हैं।

आँसू बाढ़ बन गए हैं, पैर थक गए हैं, और आँखों की सफ़ेदी और पुतलियाँ बही जा रही हैं। सूरदास कहते हैं: अब ब्रज डूब रहा है, आप आकर उसे उबार क्यों नहीं लेते?

इस भजन के बारे में

कृष्ण के वृंदावन छोड़कर मथुरा चले जाने के बाद गोपियाँ बोल रही हैं। परंपरा के अनुसार सूरदास नेत्रहीन थे, और उन्होंने पूरा पद आँखों पर ही लिखा है: बहता काजल, काले गाल, स्वयं आँखों का बह जाना। अंतिम पंक्ति निजी दुख को पूरे ब्रज का दुख बना देती है, सारा ब्रज डूब रहा है, और उन कृष्ण को पुकारती है जिन्होंने कभी इंद्र की वर्षा से ब्रज को बचाने के लिए गोवर्धन उठाया था। पुष्टिमार्गीय मंदिरों में वर्षा के महीनों में यह गाया जाता है।

Sursagar, Bhramargeet section; text as on Kavita Kosh