श्रीकृष्ण

जसोदा हरि पालनैं झुलावै

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ-जोइ कछु गावै॥

मेरे लाल कौं आउ निंदरिया काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥

कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि-करि सैन बतावै॥

इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ सो नँद-भामिनि पावै॥

अर्थ

यशोदा हरि को पालने में झुला रही हैं। कभी झुलाती हैं, कभी दुलारती हैं, कभी पुचकारती हैं और जो मन में आता है गाती जाती हैं।

“अरी निंदिया, मेरे लाल के पास आ! तू आकर इसे सुलाती क्यों नहीं? जल्दी क्यों नहीं आती? तुझे कान्हा बुला रहा है।”

कभी हरि पलकें मूँद लेते हैं, कभी होंठ फड़काने लगते हैं। उन्हें सोया जानकर माता चुप हो जाती हैं और इशारों से दूसरों को भी चुप रहने को कहती हैं।

इसी बीच हरि अकुलाकर जाग उठते हैं, और यशोदा फिर मधुर स्वर में गाने लगती हैं। सूर कहते हैं: जो सुख देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है, वह नंदरानी पा रही हैं।

इस भजन के बारे में

यह लोरी भी है और एक दृश्य भी: माँ नींद को नाम लेकर पुकारती है, बच्चे की पलकें झुकती हैं, घरवालों को चुप रहने के इशारे होते हैं, फिर अचानक बच्चा जागता है और गीत फिर शुरू होता है। जन्माष्टमी की रात, आधी रात के जन्म के बाद, पुष्टिमार्गीय मंदिरों और बहुत से घरों में बालगोपाल को सजे पालने में रखकर झुलाते हुए यह पद गाया जाता है। जिस माँ ने कभी बच्चे को गाकर सुलाया है, वह इसकी हर पंक्ति पहचानती है।

Sursagar, Dasham Skandh (balleela), raga Dhanashri; text as on Kavita Kosh