मैया कबहुँ बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लाँबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुइँ लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
Maiya kabahun badhaigi choti,
kiti ber mohi dudh piyat bhai yah ajahun hai chhoti.
Tu jo kahati Bal ki beni jyon hvai hai lanbi moti,
kadhat guhat nhavavat jaihai nagin-si bhuin loti.
Kacho dudh piyavati pachi pachi deti na makhan roti,
Surdas tribhuvan manmohan Hari Haladhar ki joti.
अर्थ
“मैया, मेरी चोटी कब बढ़ेगी? मुझे दूध पीते कितनी देर हो गई, फिर भी यह अभी तक छोटी ही है।
तू तो कहती थी कि यह बलराम भैया की चोटी की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी, और कंघी करते, गूँथते, नहलाते हुए नागिन की तरह ज़मीन तक लोटने लगेगी।
तू बार-बार कच्चा दूध पिलाती है, पर माखन-रोटी नहीं देती।” सूरदास कहते हैं: कृष्ण और बलराम की यह जोड़ी तीनों लोकों का मन मोह लेती है।
इस भजन के बारे में
यशोदा ने बेटे को दूध पिलाने के लिए एक लालच दिया था: इससे तेरी चोटी दाऊ जैसी बढ़ेगी। अब कान्हा ने उन्हें पकड़ लिया है। सूरदास बच्चे की शिकायत को इतनी सच्चाई से चित्रित करते हैं, कितना दूध पिया उसकी गिनती, बड़े भाई से नाप-तोल, कि ब्रज की माताएँ आज भी छोटे बेटे की चोटी गूँथते हुए यह गाती हैं। यह “मैया मैं नहिं माखन खायो” वाली सूरसागर की उसी बाल-लीला श्रृंखला का पद है।
Sursagar, Dasham Skandh (balleela), raga Ramkali; text as on Kavita Kosh
