श्रीकृष्ण

चरन कमल बंदौं हरि राई

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

चरन कमल बंदौं हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर कों सब कछु दरसाई॥

बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तेहि पाई॥

अर्थ

मैं राजाधिराज श्रीहरि के चरण-कमलों की वंदना करता हूँ, जिनकी कृपा से लँगड़ा पहाड़ लाँघ जाता है और अंधे को सब कुछ दिखने लगता है।

उनकी कृपा से बहरा सुनने लगता है, गूँगा फिर से बोलने लगता है और कंगाल सिर पर राजछत्र धारण करके चलता है। सूरदास कहते हैं: मेरे स्वामी करुणामय हैं, मैं बार-बार उनके चरणों की वंदना करता हूँ।

इस भजन के बारे में

सूरसागर के बहुत से संस्करण इसी पद से आरंभ होते हैं, इसलिए यह सूरदास का मंगलाचरण माना जाता है। यह छोटा है, चार पंक्तियों का, और इसका हर बिंब उलटफेर है: लँगड़े का पहाड़ चढ़ना, अंधे का देखना, भिखारी का राजछत्र के नीचे चलना। जिस कवि को परंपरा नेत्रहीन मानती है, उसके मुख से “आंधर कों सब कछु दरसाई” को भक्त निजी गवाही की तरह सुनते हैं। कीर्तन मंडलियाँ लीला-पदों से पहले इसी से आरंभ करती हैं।

Sursagar, opening pada (Pratham Skandh); text as on Kavita Kosh