श्रीकृष्ण

मैया, मैं नहिं माखन खायो

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

मैया! मैं नहिं माखन खायो।
जानि परै ये सखा सबै मिलि मेरो मुख लपटायो॥

देखि तुही छींके पर भाजन ऊँचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो॥

मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि साँटि मुसुकाइ जसोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्रताप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥

अर्थ

“मैया, मैंने माखन नहीं खाया! मुझे तो लगता है ये सब सखा मिलकर मेरे मुँह पर लगा गए हैं।

तू ही देख, तूने मटकी छींके पर कितनी ऊँची लटका रखी है। मैं कहता हूँ, अपने इन छोटे-छोटे हाथों से मैं वहाँ तक कैसे पहुँच सकता हूँ?”

मुँह से दही पोंछकर उन्होंने एक चतुराई की और दोना पीठ के पीछे छिपा लिया। यशोदा ने छड़ी फेंक दी, मुस्कुराईं और श्याम को गले से लगा लिया।

इस बाल-क्रीड़ा ने माता का मन आनंद से मोह लिया और भक्ति का प्रताप दिखा दिया। सूरदास कहते हैं: यशोदा को जो सुख मिला, वह शिव और ब्रह्मा को भी नहीं मिला।

इस भजन के बारे में

सूरदास के बाल-लीला पदों में सबसे प्रसिद्ध। नन्हे कृष्ण मुँह पर माखन लगे पकड़े गए हैं और छोटे वकील की तरह अपना पक्ष रखते हैं: सखाओं का दोष, ऊँचे छींके का दोष, मेरे छोटे हाथ देखो। फिर दोना पीठ के पीछे छिपा लेते हैं, और यशोदा हार मान लेती हैं। अंतिम पंक्ति में सूरदास बताते हैं कि भक्त के लिए इस दृश्य का अर्थ क्या है: माँ का यह प्रेम ऐसा सुख है जो शिव और ब्रह्मा को भी नहीं मिला। हर जन्माष्टमी पर यह गाया जाता है, और प्रायः बच्चा मंच पर सूरदास का पहला पद यही गाता है।

Sursagar, Dasham Skandh (balleela), raga Ramkali; text as on Kavita Kosh