श्रीकृष्ण

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥

महामोह के नूपुर बाजत, निंदा सबद रसाल।
भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल॥

तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल।
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥

कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अबिद्या दूरि करौ नँदलाल॥

अर्थ

हे गोपाल, अब मैं बहुत नाच चुका। काम और क्रोध का चोला पहनकर, गले में विषयों की माला डालकर नाचता रहा।

महामोह के घुँघरू बजते रहे और निंदा ही मीठा गीत बनी। भ्रम में भीगा मन पखावज बन गया और उल्टी-सीधी चाल चलता रहा।

तृष्णा भीतर बैठकर तरह-तरह की ताल देती हुई गाती रही। कमर में माया का फेंटा बाँधा और माथे पर लोभ का तिलक लगाया।

जल और थल में न जाने कब से मैंने स्वाँग भरकर करोड़ों कलाएँ दिखाईं, समय की सुध ही नहीं रही। हे नंदलाल, सूरदास का सारा अज्ञान दूर कर दीजिए।

इस भजन के बारे में

पूरा जीवन एक थके हुए नर्तक का नाच मानकर देखा गया है। वेश का हर हिस्सा एक दोष है: क्रोध का चोला, लोभ का तिलक, मोह के घुँघरू, बेताल बजता मन रूपी पखावज। फिर नर्तक रुकता है और नंदलाल से तमाशा समाप्त करने की विनती करता है। वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग में दीक्षा से पहले के सूरदास के विनय पद इसी तरह की आत्म-ग्लानि से भरे हैं; परंपरा कहती है कि तब आचार्य ने उन्हें श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाने की ओर मोड़ दिया।

Sursagar, vinaya padas (Pratham Skandh); text as on Kavita Kosh