आज भी खड़ा

आप्पुडैयार मन्दिर, तिरुवाप्पनूर (सेल्लूर, मदुरै)

मीनाक्षी मन्दिर से वैगै के पार तेवारम धाम, जहाँ स्वामी ने नदी की बालू को चावल बना दिया। सम्बन्दर ने इसे गाया।

निर्माण: पाण्ड्यों ने आरम्भ किया, नायकों के समय विस्तार; सेतुपतियों ने भी दान दिएस्थान: तमिलनाडु (मदुरै, वैगै का उत्तरी तट)देवता: भगवान शिव आप्पुडैयार (अन्नविनोदर, वृषभपुरेशर) रूप में; देवी कुरवंगमऴ कुऴलि (सुगन्ध कुन्तलाम्बिका)9.93° N, 78.12° E
चित्र: Mohan Krishnan (talk) · CC BY-SA 3.0

01बालू से चावल

आप्पु खूँटा या कील है। मन्दिर की कथा कहती है कि शिकार पर निकले पाण्ड्य राजा सोऴान्तकन को यहाँ पहली बार स्वयम्भू लिंग मिला, और नाम एक खूँटे से है जो लिंग बन गया। अकाल में एक पुजारी ने नदी की बालू उबालने रखी और स्वामी ने उसे चावल बना दिया, इसलिए वे अन्नविनोदर हैं, अन्न से लीला करने वाले। धाम सोमास्कन्द प्रकार का है, माता-पिता के देवालयों के बीच मुरुगन। पंगुनि उत्तिरम पर मीनाक्षी और सुन्दरेश्वर बड़े मन्दिर से नदी पार कर यहाँ आते हैं और ऋषभ वाहन पर लौटते हैं।

दर्शन और यात्रा

मदुरै के सेल्लूर में; सिम्मक्कल से वैगै पार करें, या पेरियार बस अड्डे से तिरुवाप्पुडैयार कोविल ठहराव की नगर-बस लें। मासि ब्रह्मोत्सव और नवरात्रि मनाए जाते हैं।