01पहाड़ी पर विवाह
स्कन्द पुराण और तमिल कन्द पुराणम् बताते हैं कि जब मुरुगन ने असुर सूरपद्मन का नाश किया, तब इंद्र ने अपनी पुत्री देवसेना उन्हें ब्याह दी, और विवाह इसी पहाड़ी पर हुआ। संगम संग्रह में नक्कीरर का तिरुमुरुगाऱ्ऱुप्पडै मुरुगन के धामों में तिरुप्परंकुन्ड्रम का नाम सबसे पहले लेता है। चट्टान में भीतर कटे गर्भगृह में मुरुगन देवसेना के साथ विराजते हैं; उसी चट्टान में आसपास परंकुन्ड्रनाथर रूप में शिव, दुर्गा, विष्णु और गणेश हैं। विशेष बात यह है कि यहाँ अभिषेक मुरुगन को नहीं, उनके वेल (भाले) को किया जाता है।
02पाण्ड्य चट्टान और नायक मण्डप
गुफा का एक अभिलेख बताता है कि 773 ई. में पाण्ड्य राजा जटिल परान्तक नेडुंजडैयन के मंत्री सात्तन गणपति ने देवालय का जीर्णोद्धार कराया और सरोवर खुदवाया, और उनकी पत्नी ने दुर्गा का देवालय बनवाया। पहाड़ी के अन्य शैलकृत कक्ष भी उसी पाण्ड्य काल के हैं। चट्टान के सामने मदुरै के नायकों ने नक्काशीदार याळियों वाले ऊँचे स्तम्भयुक्त मण्डप और गोपुर जोड़े, जिससे दर्शनार्थी मण्डपों से होकर ऊपर चढ़ता है और अंत में पुरानी गुफा तक पहुँचता है। पहाड़ी के दूसरी ओर जैन शय्याएँ और तमिल-ब्राह्मी अभिलेख इनसे भी पुराने हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 773 ई.पाण्ड्य मंत्री सात्तन गणपति ने गुफा-देवालय का जीर्णोद्धार कराया और सरोवर खुदवाया।
- 16वीं–17वीं शताब्दीमदुरै के नायकों ने सामने के मण्डप और गोपुर जोड़े।
मदुरै नगर से लगभग 8 किमी दक्षिण-पश्चिम; स्कन्द षष्ठी और पंगुनि उत्तिरम मुख्य उत्सव हैं।




