दिवेर की मुग़ल चौकी नष्ट हुई और उसका सेनानायक मारा गया; पूरे मेवाड़ में मुग़ल चौकियाँ एक-एक कर गिरीं।
01अमरसिंह का भाला
हल्दीघाटी के बाद प्रताप की रसद रोकने के लिए पूरे मेवाड़ में मुग़ल चौकियाँ बिठा दी गई थीं। मन्त्री भामाशाह द्वारा जुटाए धन से प्रताप ने फिर सेना खड़ी की और कुम्भलगढ़ के मार्ग के दर्रे दिवेर पर प्रहार किया। मेवाड़ के वृत्तांत कहते हैं कि राजकुमार अमरसिंह ने सेनानायक सुल्तान ख़ाँ को उसके घोड़े समेत भाले से बींध दिया। चौकी की सेना बिखर गई, और जो बचे वे अगले मुग़ल थाने की ओर भागे।
02मेवाड़ फिर हाथ आया
आगे के वर्षों में मेवाड़ भर के मुग़ल थाने छीन लिए गए या छोड़ दिए गए। 1597 में चावंड में देहत्याग तक प्रताप चित्तौड़, माण्डलगढ़ और पूर्वी परगनों को छोड़ लगभग पूरा राज्य वापस पा चुके थे। कर्नल टॉड ने बाद में दिवेर को मेवाड़ का मैराथन कहा। यह युद्ध मुख्यतः मेवाड़ के अपने अभिलेखों और चारण परम्परा से ज्ञात है; फ़ारसी इतिहास इस पर मौन हैं। मेवाड़ की अपनी स्मृति स्पष्ट है: यहीं से धारा पलटी।

दिवेर से मेवाड़ की वह पुनःप्राप्ति आरम्भ हुई जिससे प्रताप अपने ही देश में स्वतन्त्र राजा के रूप में देह त्याग सके।
