चित्र: Bernard Gagnon · CC BY-SA 3.0
शिलालेख · लगभग 1380 ई.पू.

बोगाज़कोई संधि-पत्र: मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य का साक्ष्य

प्राप्ति
हित्ती राजधानी हत्तुसा (बोगाज़कोई, मध्य तुर्की) के राज-अभिलेखागार की मिट्टी की पट्टिकाएँ, जिन्हें ह्यूगो विंकलर ने 1906–07 में खोदकर निकाला
अब कहाँ
तुर्की के संग्रहालयों में रखे हित्ती पट्टिका-संग्रह

हित्ती सम्राट सुप्पिलुलियुमा प्रथम और उत्तरी सीरिया के मितन्नी राजकुमार शत्तिवाज़ा के बीच हुई संधि, जिसमें दोनों राज्यों के देवताओं को साक्षी बनाया गया। मितन्नी के देवताओं में चार नाम ऐसे हैं जिन्हें हर वैदिक पुरोहित पहचान लेगा।

यह क्या कहता है

देव-साक्षियों की सूची में मितन्नी पक्ष मि-इत-र, उ-रु-व-न, इन-द-र और ना-स-अत-ति-य का आह्वान करता है, अर्थात् मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य (अश्विनीकुमार), वही देवता जिनकी ऋग्वेद में साथ-साथ स्तुति है। इसी अभिलेखागार से मितन्नी प्रशिक्षक किक्कुली का अश्व-प्रशिक्षण ग्रंथ मिला है, जिसमें ऐका (एक), तेरा (त्रि), पंज़ा (पञ्च) और सत्ता (सप्त) जैसे भारतीय संख्या-शब्द हैं।

यह क्या सिद्ध करता है

यह वैदिक देवताओं का अब तक का सबसे पुराना तिथियुक्त लिखित उल्लेख है, और वह भी भारत से बहुत दूर; अतः ई.पू. चौदहवीं शताब्दी तक वैदिक देवताओं का नाम लेकर आह्वान हो रहा था।

इनका प्रमाण