सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग बिदुर घर पाई॥
जूठे फल सबरी के खाये, बहुबिधि प्रेम लगाई।
प्रेम के बस नृप सेवा कीनी, आप बने हरि नाई॥
राजसुयज्ञ युधिष्ठिर कीनो, तामैं जूठ उठाई।
प्रेम के बस अर्जुन-रथ हाँक्यो, भूल गए ठकुराई॥
ऐसी प्रीत बढ़ी बृंदाबन, गोपिन नाच नचाई।
सूर क्रूर इस लायक नाहीं, कहँ लगि करौं बड़ाई॥
Sabse unchi prem sagai,
Duryodhan ki meva tyagi, sag Bidur ghar pai.
Juthe phal Sabri ke khaye, bahubidhi prem lagai,
prem ke bas nrip seva kini, ap bane Hari nai.
Rajasuyagya Yudhishthir kino, tamain juth uthai,
prem ke bas Arjun-rath hankyo, bhul gae thakurai.
Aisi prit badhi Brindaban, gopin nach nachai,
Sur krur is layak nahin, kahan lagi karaun badai.
अर्थ
सबसे ऊँचा नाता प्रेम का नाता है। भगवान ने दुर्योधन के मेवे त्याग दिए और विदुर के घर साग खाया।
शबरी के चखे हुए फल प्रेम से खाए। प्रेम के वश होकर एक राजा की सेवा की और स्वयं हरि नाई बने।
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तो उसमें जूठी पत्तलें उठाईं। प्रेम के वश अर्जुन का रथ हाँका और अपनी प्रभुता भूल गए।
वृंदावन में ऐसी प्रीति बढ़ी कि गोपियों ने उन्हें अपने इशारों पर नचाया। सूर कहते हैं: मैं कठोर-हृदय इस योग्य नहीं, उनकी बड़ाई कहाँ तक करूँ।
इस भजन के बारे में
यह पद किसी कथावाचक के प्रमाणों की सूची जैसा बना है; हर पंक्ति एक प्रसिद्ध प्रसंग है जिसमें भगवान प्रेम के लिए झुक जाते हैं: विदुर का साग, शबरी के बेर, राजसूय की पत्तलें, अर्जुन के रथ की लगाम। हरि के नाई बनने वाली पंक्ति नाई-संत सेन जी की कथा की ओर संकेत करती है, जिनके स्थान पर कहा जाता है कि भगवान ने स्वयं राजा के दरबार में उनकी सेवा की। प्रवचनकार इसकी पहली पंक्ति बार-बार उद्धृत करते हैं।
Attributed to Surdas in the bhajan tradition; text as on Kavita Kosh
