अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
रामकृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥
पायो नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं॥
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं।
मन मधुपहिं प्रन करि तुलसी, रघुपति पदकमल बसैहौं॥
Ab laun nasani, ab na nasaihaun,
Ramkripa bhav-nisa sirani, jage phiri na dasaihaun.
Payo nam charu chintamani, ur kar ten na khasaihaun,
Syam roop suchi ruchir kasauti, chit kanchanahin kasaihaun.
Parbas jani hansyo in indrin, nij bas hvai na hansaihaun,
man madhupahin pran kari Tulsi, Raghupati padkamal basaihaun.
अर्थ
अब तक जीवन व्यर्थ गया, पर अब और व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। श्रीराम की कृपा से संसार रूपी रात बीत गई है; अब जाग गया हूँ तो फिर से नींद का बिछौना नहीं बिछाऊँगा।
मुझे राम-नाम रूपी सुंदर चिंतामणि मिल गई है, उसे हृदय रूपी हाथ से गिरने नहीं दूँगा। श्याम के पवित्र, सुंदर रूप की कसौटी पर अपने मन रूपी सोने को कसूँगा।
मुझे पराधीन जानकर ये इंद्रियाँ मेरी हँसी उड़ाती रहीं; अब अपने वश में होकर उनकी हँसी का पात्र नहीं बनूँगा। तुलसी ने मन रूपी भौंरे से प्रण करा लिया है कि उसे श्रीरघुनाथ के चरण-कमलों में बसाऊँगा।
इस भजन के बारे में
विनय पत्रिका का 105वाँ पद जागने पर लिया गया प्रण है। इसकी पहली पंक्ति, “अब लौं नसानी, अब न नसैहौं”, नया जीवन शुरू करने के अर्थ में हिंदी की कहावत बन गई है, जिसे वे लोग भी बोलते हैं जिन्होंने यह ग्रंथ कभी नहीं खोला। हर बिंब तुलसीदास की काशी के रोज़ के जीवन से है: रात का बीतना, सुनार की कसौटी, कमल पर बैठता भौंरा। सत्संग मंडलियाँ इसे एकादशी पर और व्रत के आरंभ में गाती हैं।
Vinaya Patrika, pada 105 (Gita Press); checked against Kavita Kosh
