आज भी खड़ा

पुरुषोत्तम पेरुमाळ मन्दिर, तिरुक्करम्बनूर (उत्तमर कोविल)

श्रीरंगम के पास एक मन्दिर जहाँ विष्णु, ब्रह्मा और शिव, तीनों एक ही प्राकार के भीतर पूजे जाते हैं। लक्ष्मी जी ने यहाँ शिव का भिक्षापात्र भरा, इसलिए वे पूर्णवल्ली हैं, पात्र भरने वाली।

निर्माण: तिरुमंगै आळ्वार द्वारा गाया गया; चोल देश का पत्थर का मन्दिर, बाद में विजयनगर और नायक काल का कामस्थान: तमिलनाडु (तिरुच्चिरापल्ली)देवता: भगवान विष्णु पुरुषोत्तमन, शयन मुद्रा में, पूर्णवल्ली तायार के साथ; उसी परिसर में ब्रह्मा और भिक्षाटन रूप में शिव10.88° N, 78.70° E
  1. आळ्वार काल
  2. 1751
चित्र: Ssriram mt · CC BY-SA 4.0

01भरा हुआ भिक्षापात्र

मन्दिर की कथा एक कदम्ब वृक्ष से आरम्भ होती है। ब्रह्मा की भक्ति परखने विष्णु यहाँ वृक्ष बनकर खड़े हुए, और ब्रह्मा ने पूजा में उसका अभिषेक किया; वह जल कदम्ब तीर्थम बना, और पुराना नाम कदम्बनूर करम्बनूर हो गया। आगे चलकर शिव भिक्षाटन रूप में इधर आए, ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर उनके हाथ से चिपका हुआ। विष्णु के कहने पर लक्ष्मी जी ने उन्हें भिक्षा दी, कपाल पात्र पहली बार भरा, और शिव का भार हल्का होने लगा। वह पूरी तरह तिरुक्कण्डियूर में उतरा। इसलिए तायार पूर्णवल्ली हैं, और सरस्वती सहित ब्रह्मा तथा भिक्षाटन रूप शिव के सन्निधि पुरुषोत्तमन के साथ एक ही प्राकार में हैं।

02करम्बनूर उत्तमन

तिरुमंगै आळ्वार एक पाशुरम में पेरुमाळ को ‘करम्बनूर उत्तमन’ कहते हैं, और इसी शब्द से गाँव का प्रचलित नाम उत्तमर कोविल पड़ा। मन्दिर परम्परा कहती है कि श्रीरंगम की दीवारें बनवाते समय आळ्वार यहीं ठहरे थे। मन्दिर में सप्तगुरु भी हैं, एक ही स्थान पर सात गुरु: भिक्षाटन रूप शिव, ब्रह्मा, सौन्दर्य पार्वती, बृहस्पति, वरदराज, मुरुगन और शुक्र। पेरुमाळ पूर्वमुख शयन मुद्रा में हैं। उत्तमर कोविल का प्रबन्ध तमिलनाडु हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ बन्दोबस्ती विभाग करता है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. आळ्वार कालतिरुमंगै आळ्वार करम्बनूर उत्तमन का गान करते हैं।
  2. 1751तिरुच्चिरापल्ली के आसपास अंग्रेज़-फ़्रांसीसी लड़ाई में सैनिक मन्दिर का उपयोग करते हैं, पर उसे क्षति नहीं पहुँचती।
दर्शन और यात्रा

कोल्लिडम के उत्तरी तट पर सेलम मार्ग पर, श्रीरंगम से लगभग 3 किमी। पेरुमाळ के बाद उसी प्राकार के भीतर ब्रह्मा और भिक्षाटन सन्निधि के दर्शन करें।