01माँ का उपचार, पेशवा की पहाड़ी
पेशवाओं से पहले पहाड़ी पर स्थानीय तावरे परिवार का एक छोटा देवी-स्थान भर था। बालाजी बाजीराव की माता काशीबाई के पैर में पीड़ा रहती थी, और विवरण है कि इसी देवी के अंगारे, पवित्र भस्म, से उन्हें आराम मिला। कृतज्ञता में पेशवा ने पहाड़ी ख़रीदी और 1749 से उसकी चोटी पर मंदिर-परिसर बनवाया: शिव का देवदेवेश्वर मंदिर, जिसमें शिव, पार्वती और गणेश की चाँदी की मूर्तियाँ हैं, और चारों ओर विष्णु, कार्तिकेय और विट्ठल के मंदिर। नीचे से 108 सीढ़ियों की चौड़ी पत्थर की सीढ़ी चढ़ती है, इतनी सहज कि हाथी भी चढ़ सकें।
02पानीपत के बाद
14 जनवरी 1761 को पानीपत में मराठा सेना नष्ट हुई; पेशवा के पुत्र विश्वासराव और चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ वीरगति पाने वालों में थे। नानासाहेब तक जो सांकेतिक संदेश पहुँचा उसमें दो मोती घुल जाने और सत्ताईस अशर्फ़ियाँ खो जाने की बात थी। वे फिर सँभल न सके। वे पर्वती आ गए और जून 1761 में यहीं उनका देहांत हुआ। पहाड़ी पर एक छोटा संग्रहालय पेशवाकालीन वस्तुएँ सँजोए है, और ऊपर से पूरा पुराना पुणे नीचे फैला दिखता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1749नानासाहेब पेशवा पर्वती पर देवदेवेश्वर मंदिर आरंभ करते हैं।
- जून 1761पानीपत की हार के बाद नानासाहेब पेशवा का पर्वती पर देहांत होता है।
- 1817कहा जाता है कि अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय ने खड़की की लड़ाई इसी पहाड़ी से देखी।
सीढ़ियाँ दक्षिण पुणे के पर्वती पायथा से शुरू होती हैं; चढ़ाई लगभग 15 मिनट की है। सुबह ठंडक रहती है और दृश्य साफ़ दिखता है।




