01एक पिता का शोक
दगडूशेठ गाडवे पुणे के बुधवार पेठ के संपन्न हलवाई थे। जब उनका इकलौता पुत्र छोटी आयु में चल बसा, तो वे और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई शोक में डूब गए, और गुरु के कहने पर उन्होंने गणपति की मूर्ति स्थापित कर उन्हीं की सेवा अपनी संतान की तरह की। हर वर्ष गणेशोत्सव में घर की पूरी भक्ति से गणपति की पूजा होती। 1893 में जब बाल गंगाधर तिलक ने पुणे से गणेशोत्सव को घरों से निकालकर सड़कों पर लाने का आह्वान किया, तब दगडूशेठ गणपति उसके केंद्रों में से एक बने, और तिलक स्वयं इसके आरंभिक दर्शनार्थियों में याद किए जाते हैं।
02सोना, रोशनी और हर वर्ष नया मंडप
लगभग साढ़े सात फुट की, सोने से सजी मूर्ति एक छोटे मंदिर में विराजती है जिसका सामने का भाग सड़क की ओर खुला है, इसलिए राहगीर फुटपाथ से ही दर्शन कर लेते हैं। गणेशोत्सव के दस दिनों के लिए न्यास हर वर्ष नया मंडप बनाता है, प्रायः किसी प्रसिद्ध मंदिर की प्रतिकृति, और दिन-रात लाखों लोग उसमें से गुज़रते हैं। अंतिम दिन दगडूशेठ गणपति की शोभायात्रा नगर में सबसे अधिक देखी जाने वाली यात्राओं में है। संस्थापकों के परिवारों द्वारा चलाया जाने वाला न्यास वृद्धाश्रम, विद्यालय और एम्बुलेंस भी चलाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1893तिलक पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करते हैं; दगडूशेठ गणपति उसके केंद्रों में होते हैं।
शनिवार वाड़ा के पास बुधवार पेठ में; भोर से देर रात तक खुला। गणेशोत्सव में भीड़ बहुत होती है, आधी रात के बाद या भोर में जाएँ।




