आज भी खड़ा

गोवर्धन

ब्रज की बलुआ पत्थर की नीची पहाड़ी, जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र की वर्षा से व्रजवासियों को बचाने के लिए सात दिन अपनी कनिष्ठा पर उठाए रखा। तीर्थयात्री इसकी 21 किमी की परिक्रमा नंगे पाँव करते हैं, और पहाड़ी स्वयं गिरिराज रूप में पूजी जाती है।

निर्माण: गिरिराज, जिसे श्रीकृष्ण ने उठाया; मन्दिर सोलहवीं शताब्दी सेस्थान: उत्तर प्रदेश (मथुरा ज़िला)देवता: गिरिराज गोवर्धन; गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण27.50° N, 77.46° E
  1. सोलहवीं शताब्दी का आरम्भ
  2. 1669
  3. 1672
  4. 1763 के बाद
चित्र: Gyanendra_Singh_Chau… · CC BY 3.0

01गिरिराज

भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में यह कथा है। व्रज के गोप इन्द्र के लिए वार्षिक यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। बालक कृष्ण ने नन्द बाबा से पूछा, क्यों? गायें गोवर्धन पर चरती हैं और वर्षा अपने स्वभाव से होती है, तो पहाड़ी की पूजा करें। उन्होंने भोजन का पर्वत चढ़ाकर ऐसा ही किया। इन्द्र ने व्रज को डुबाने के लिए आँधी भेजी, और कृष्ण ने गोवर्धन को एक हाथ से उठाकर सात दिन-रात छत्र की तरह थामे रखा। इसीलिए दीपावली के अगले दिन अन्नकूट बनता है, और इसीलिए पहाड़ी का हर पत्थर स्वयं कृष्ण माना जाता है। तीर्थयात्री कोई पत्थर साथ नहीं ले जाते।

02श्रीनाथजी और परिक्रमा

पुष्टिमार्ग बताता है कि बायाँ हाथ उठाए कृष्ण, श्री गोवर्धननाथजी का स्वरूप, पहाड़ी से प्रकट हुआ, और वल्लभाचार्य ने सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में गोवर्धन पर एक मन्दिर में उसकी सेवा स्थापित की। 1669 में जब औरंगज़ेब ने ब्रज के मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया, तो सेवक प्रतिमा को बैलगाड़ी में ले निकले; 1672 में वह मेवाड़ के सिंहाड़ पहुँची, जो नाथद्वारा बना। सात कोस, लगभग 21 किमी, की परिक्रमा मानसी गंगा, दान घाटी, राधा कुण्ड और कुसुम सरोवर से होकर जाती है, जहाँ भरतपुर के जवाहर सिंह ने अपने पिता सूरजमल की छतरी बनवाई। कुछ भक्त दण्डवत परिक्रमा करते हैं, हर पग पर पूरा लेटकर।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. सोलहवीं शताब्दी का आरम्भवल्लभाचार्य गोवर्धन पर श्रीनाथजी की सेवा स्थापित करते हैं।
  2. 1669ब्रज के मन्दिरों के विरुद्ध औरंगज़ेब के आदेश के भय से सेवक श्रीनाथजी को ले निकलते हैं।
  3. 1672श्रीनाथजी मेवाड़ के सिंहाड़, आज के नाथद्वारा, पहुँचते हैं।
  4. 1763 के बादजवाहर सिंह कुसुम सरोवर पर सूरजमल की छतरी बनवाते हैं।
दर्शन और यात्रा

मथुरा से 25 किमी पश्चिम। पैदल परिक्रमा में पाँच-छह घण्टे लगते हैं; सबसे बड़ी भीड़ गुरु पूर्णिमा (मुड़िया पूनो) और दीपावली के बाद अन्नकूट पर होती है।