खंडहर

कुम्हेर दुर्ग

मिट्टी की दीवारों वाला जाट गढ़ जहाँ 1754 में सूरजमल ने मराठा सेना और उसके मुग़ल साथियों के सामने चार महीने मोर्चा सँभाला। मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव इसकी दीवारों से चली गोली से मारे गए।

निर्माण: जाट राजाओं का मिट्टी का दुर्ग, 18वीं शताब्दी का आरंभस्थान: राजस्थान (भरतपुर ज़िला)27.32° N, 77.37° E
  1. जनवरी 1754
  2. मार्च 1754
  3. मई 1754
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain

011754 का घेरा

जनवरी 1754 में मुग़ल वज़ीर इमादुलमुल्क के बुलावे पर रघुनाथराव और मल्हारराव होलकर की मराठा सेना ने सूरजमल से कर माँगा। उन्होंने मना कर दिया और कुम्हेर में बंद हो गए, मोटी मिट्टी की प्राचीरों और गहरी खाइयों का दुर्ग जिसमें तोप के गोले टूटते नहीं, धँस जाते थे। घेरा वसंत तक खिंचा। मार्च में मोर्चे देखते खंडेराव होलकर दीवार से चली गोली से मारे गए। मल्हारराव ने कुम्हेर को ढहाकर उसकी मिट्टी यमुना में फेंकने की सौगंध खाई, पर मई तक जाट रानी किशोरी और जयप्पा सिंधिया ने समझौता करा दिया, और सेना भुगतान के वचन के साथ लौट गई।

02कुम्हेर में अहिल्या

कुम्हेर में खंडेराव की मृत्यु ने मालवा की अगली आधी शताब्दी का रूप तय किया। उनकी पत्नी अहिल्याबाई सती होने को तैयार थीं, और मल्हारराव ने उनसे जीवित रहकर राजकाज में हाथ बँटाने की विनती की। उन्होंने वैसा ही किया, और 1766 में मल्हारराव के बाद लगभग तीस वर्ष महेश्वर से होलकर राज्य चलाया, सोमनाथ से काशी तक मंदिर और घाट फिर से बनवाए। दुर्ग के नाम पर इस छोटे क़स्बे में अब टूटी प्राचीरें और जाट राजाओं का एक महल ही बचा है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. जनवरी 1754मराठा सेना सूरजमल को कुम्हेर में घेरती है।
  2. मार्च 1754खंडेराव होलकर मोर्चे पर मारे जाते हैं।
  3. मई 1754समझौते से घेरा समाप्त होता है।