आज भी खड़ा

कन्याकुमारी भगवती अम्मन मंदिर

भारत के दक्षिणी छोर पर, जहाँ अरब सागर, हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी मिलते हैं, देवी कुमारी कन्या के रूप में आज भी शिव की प्रतीक्षा में खड़ी हैं। 1892 में विवेकानन्द ने तट के पास की शिला पर ध्यान किया।

निर्माण: तीन समुद्रों के संगम पर प्राचीन मंदिरस्थान: तमिलनाडुदेवता: देवी कन्या कुमारी8.08° N, 77.56° E
  1. 24 दिसंबर 1892
  2. 1970
चित्र: Sujithshivam511 · CC BY-SA 4.0

01वह विवाह जो हुआ नहीं

असुर बाणासुर केवल एक कुमारी के हाथों मर सकता था, और देवी उसका नाश करने यहाँ कन्या रूप में प्रकट हुईं। शुचीन्द्रम के शिव उनसे विवाह करना चाहते थे, और मुहूर्त आधी रात का तय हुआ। देवता जानते थे कि विवाह होने पर असुर बच जाएगा, इसलिए नारद ने भोर से पहले मुर्गे की बाँग दी; शिव ने मुहूर्त निकला जानकर लौट गए। भोज के लिए रखे चावल और अनाज रंग-बिरंगी बालू बन गए, जो आज भी इस तट पर मिलती है। देवी ने बाणासुर का वध किया और कन्या कुमारी ही रहीं, हाथ में जपमाला लिए शिव के लिए तप करती हुई।

02समुद्र की शिला

तट के पास वह शिला है जहाँ, परंपरा कहती है, देवी ने तप किया; उस पर एक पदचिह्न उनका मानकर पूजा जाता है। स्वामी विवेकानन्द 24 दिसंबर 1892 को तैरकर उस तक गए और तीन दिन भारत के भविष्य पर ध्यान किया। एकनाथ रानडे के नेतृत्व में जन-दान से बना विवेकानन्द शिला स्मारक 1970 में खुला। मंदिर का समुद्र की ओर वाला पूर्वी द्वार वर्ष के कुछ दिनों को छोड़ बंद रहता है; कहा जाता है कि देवी की हीरे की नथ को कभी जहाज़ प्रकाश-स्तम्भ समझ बैठे थे।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 24 दिसंबर 1892स्वामी विवेकानन्द ने तट की शिला पर ध्यान किया।
  2. 1970विवेकानन्द शिला स्मारक खुला।
दर्शन और यात्रा

पुरुष कुर्ता/कमीज़ उतारकर प्रवेश करते हैं। इसी तट से सूर्योदय, और चैत्र पूर्णिमा पर सूर्यास्त के साथ चन्द्रोदय दिखता है।