चित्र: Tarun802 · CC BY-SA 4.0
रानी

रानी पद्मिनी

चित्तौड़ की रानी, जौहर के लिए स्मरणीय

चित्तौड़ की घेराबंदी, 1303 ई.

1303 में अलाउद्दीन खलजी द्वारा चित्तौड़ की घेराबंदी और उसका पतन इतिहास है, जिसे अमीर ख़ुसरो ने दर्ज किया। रावल रतन सिंह की रानी पद्मिनी और उनके नेतृत्व में हुआ जौहर हमें परंपरा से मिलते हैं: मलिक मुहम्मद जायसी का 1540 का ‘पद्मावत’ और मेवाड़ की चारण-स्मृति।

01अभिलेख क्या कहते हैं

अलाउद्दीन खलजी 28 जनवरी 1303 को चित्तौड़ के लिए निकला और गंभीरी तथा बेड़च नदियों के बीच डेरा डाला। अमीर ख़ुसरो साथ था और उसने ‘ख़ज़ाइनुल फ़ुतूह’ में लिखा कि दुर्ग लगभग आठ महीने टिका और 26 अगस्त 1303 को गिरा। ख़ुसरो के अनुसार पतन के बाद सुल्तान के आदेश से लगभग तीस हज़ार लोग मारे गए, और चित्तौड़ शहज़ादे ख़िज़्र खाँ को देकर उसका नाम ख़िज़्राबाद रखा गया। तब चित्तौड़ के शासक रत्नसिंह, यानी रावल रतन सिंह थे, जिनका नाम 1302 के दरीबा शिलालेख में है। ख़ुसरो किसी रानी का नाम नहीं लेता।

02परंपरा क्या कहती है

1540 में सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी में ‘पद्मावत’ लिखा। उसमें सिंहल की राजकुमारी पद्मावती चित्तौड़ के रतनसेन से विवाह करती है; अलाउद्दीन उसके सौंदर्य की बात सुनकर उसे पाने के लिए घेरा डालता है। रतनसेन छल से पकड़ा जाता है और गोरा-बादल के साहस से छूटता है। दुर्ग हाथ से जाने पर पद्मावती और चित्तौड़ की स्त्रियाँ बंदी होने के बजाय अग्नि में प्रवेश करती हैं। मेवाड़ के चारणों ने अपने गीतों में यही जौहर गाया, और राजपूत परिवार इसे चित्तौड़ के तीन जौहरों में पहला मानते हैं। घेराबंदी इतिहास है; रानी का नाम और उनके वचन काव्य और स्मृति में जीवित हैं।

मेवाड़ के गुहिल और सिसोदिया
राजवंश · लगभग छठी शताब्दी–1949 ई.मेवाड़ के गुहिल और सिसोदियाबप्पा रावल से महाराणा प्रताप तक मेवाड़ के घराने ने दिल्ली से आई हर शक्ति के सामने अपनी पहाड़ियाँ थामे रखीं। यह संसार के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले राजवंशों में है।पढ़ें →