01भृगु का तट और बरीगाज़ा
पुराण यहाँ नर्मदा तट पर महर्षि भृगु का आश्रम बताते हैं, और नगर का पुराना नाम भृगुकच्छ, अर्थात भृगु का तट, इसी से है; नदी तट पर भृगु ऋषि मन्दिर खड़ा है। पहली शताब्दी ई. की यूनानी नाविक-पुस्तिका पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी किसी भी अन्य भारतीय बन्दरगाह से अधिक स्थान बरीगाज़ा को देती है: ज्वार वाले मुहाने में नाविक जहाज़ों को लेने जाते थे, और यहाँ से उज्जैन और दक्कन का सूती कपड़ा, मसाले और अकीक बाहर जाते, और मदिरा, मूँगा और रोमन सोना भीतर आता। भरूच क्रमशः पश्चिमी क्षत्रपों, गुप्तों, मैत्रकों और 7वीं शताब्दी में यहीं से राज करने वाले गुर्जर राजाओं के अधीन रहा।
02आक्रमण झेले, फिर भी टिका
9वीं शताब्दी के अरब इतिहासकार अल-बलाज़ुरी लिखते हैं कि ख़लीफ़ा उमर के समय, लगभग 636 में, ओमान से भेजे गए बेड़े ने बरवास, अर्थात भरूच, पर धावा मारा, और एक शताब्दी बाद गवर्नर अल-जुनैद की सेनाओं ने उज्जैन और मालवा के साथ फिर बरवास पर प्रहार किया, जब तक प्रतिहारों और लाट के चालुक्यों ने उन्हें पीछे न धकेल दिया। आगे भरूच पाटण के चौलुक्यों, फिर गुजरात के सुल्तानों, मुग़लों, मराठों और अंग्रेज़ों के अधीन रहा, जिन्होंने इसे 1772 में और फिर 1803 में लिया। कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी यहीं 30 दिसम्बर 1887 को जन्मे; उनके उपन्यासों ने गुजरात को उसका सोलंकी अतीत लौटाया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- पहली शताब्दी ई.पेरिप्लस बरीगाज़ा को पश्चिमी भारत का मुख्य बन्दरगाह बताता है।
- लगभग 636ओमान से आया अरब बेड़ा भरूच पर धावा मारता है (अल-बलाज़ुरी)।
- लगभग 725अल-जुनैद की सेनाएँ भरूच और मालवा पर धावा मारती हैं और खदेड़ी जाती हैं।
- 30 दिसम्बर 1887भरूच में के. एम. मुंशी का जन्म।






