01पाटण और सोमनाथ के उपन्यास
कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी का जन्म भरूच में हुआ और उन्होंने बड़ौदा कॉलेज में पढ़ाई की, जहाँ श्री अरविंद उनके शिक्षकों में थे। बंबई में उनकी बड़ी वकालत चली। गुजराती में उन्होंने वे उपन्यास लिखे जिनसे पाठकों को अपना मध्यकालीन इतिहास मिला: चौलुक्य राजाओं पर पाटण त्रयी (‘पाटणनी प्रभुता’, ‘गुजरातनो नाथ’, ‘राजाधिराज’), ‘पृथिवीवल्लभ’, और 1026 के महमूद के आक्रमण पर ‘जय सोमनाथ’ (1940)। अंतिम वर्षों में उन्होंने ‘कृष्णावतार’ श्रृंखला आरंभ की। 1938 में उन्होंने बंबई में भारतीय ज्ञान के अध्ययन और प्रकाशन के लिए भारतीय विद्या भवन स्थापित किया; ‘भवन्स बुक यूनिवर्सिटी’ और बहु-खंडीय ‘हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ़ द इंडियन पीपल’ वहीं से निकले।
02संविधान, सोमनाथ और वन महोत्सव
1937–39 में वे बंबई प्रांत के गृह मंत्री रहे और संविधान की प्रारूप समिति के सदस्य थे। 1948 में वे हैदराबाद में भारत के एजेंट-जनरल रहे। नवंबर 1947 में सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, तो मुंशी ने यह काम सँभाला और पटेल के बाद उसे पूरा कराया; 11 मई 1951 को ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा हुई, और उसी वर्ष उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटर्नल’ छपी। केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के रूप में जुलाई 1950 में उन्होंने वृक्षारोपण सप्ताह ‘वन महोत्सव’ आरंभ किया। 1952 से 1957 तक वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे, 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना में भाग लिया, और 1964 में विश्व हिंदू परिषद के संस्थापकों में रहे। 8 फ़रवरी 1971 को बंबई में उनका देहांत हुआ।


