011928 का आन्दोलन
1922 में गांधीजी ने सामूहिक सविनय अवज्ञा के लिए बारडोली को चुना था, और चौरीचौरा के बाद योजना छोड़ दी गई। छह वर्ष बाद बम्बई सरकार ने तालुके का भू-राजस्व लगभग 22 प्रतिशत बढ़ा दिया। किसानों ने वल्लभभाई पटेल से नेतृत्व माँगा, और फ़रवरी 1928 से उन्होंने कुछ नहीं चुकाया। पटेल ने तालुके को शिविरों में बाँटा, रोज़ समाचार-पत्रक चलाया, और गाँवों को एक रखा। सरकार ने भैंसें ज़ब्त कीं, ज़मीनें कुर्क कर नीलाम कीं, और पठान कारिन्दे बुलाए; गाँववालों ने हफ़्तों पशुओं को घरों में बन्द रखा और तालुके में कोई ज़ब्त भूमि ख़रीदने को तैयार न हुआ।
02सरदार
अगस्त 1928 तक सरकार झुक गई। मैक्सवेल और ब्रूमफ़ील्ड नामक दो अधिकारियों की जाँच ने वृद्धि को अनुचित पाया और उसे लगभग छह प्रतिशत कर दिया; ज़ब्त भूमि और पशु लौटाए गए। बारडोली की स्त्रियाँ पहले ही पटेल को सरदार, अर्थात नायक, कहने लगी थीं, और यह नाम उनके साथ रह गया। आन्दोलन में उनका मुख्यालय, बारडोली का स्वराज आश्रम, स्मारक के रूप में सँजोया गया है। बारडोली शक्कर का नगर भी है, जहाँ गुजरात की सबसे पुरानी सहकारी शक्कर मिलों में से एक है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- फ़रवरी 1922चौरीचौरा के बाद कांग्रेस बारडोली में प्रस्तावित सविनय अवज्ञा रोक देती है।
- फ़रवरी–अगस्त 1928वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में बारडोली सत्याग्रह सरकार को राजस्व-वृद्धि का अधिकांश वापस लेने पर विवश करता है।





