01ज्ञानेश्वरी का खम्भा
ज्ञानेश्वर अपने भाइयों निवृत्तिनाथ और सोपान और बहन मुक्ताबाई के साथ नेवासा आए। शिव के एक मंदिर में एक खम्भे से टेक लगाकर बैठे, उन्होंने गीता को मराठी ओवी छन्द में कहा और सच्चिदानन्द बाबा ने उसे लिखा। अंतिम ओवियाँ स्थान बताती हैं, प्रवरा तट का नेवासे, यादव राजा रामचन्द्र का राज्य, और शक 1212, अर्थात् 1290 ई.। लगभग नौ हज़ार ओवियों की यह भावार्थदीपिका वारकरी पंथ का आधार-ग्रन्थ बनी। वह मंदिर अब ज्ञानेश्वर मंदिर है, और वह खम्भा, पैसाचा खांब, उसके भीतर खड़ा है, चन्दन से लिपा और मालाओं से लदा।
02संत से भी पुराना
नेवासा का मोहिनीराज मंदिर भगवान विष्णु के मोहिनी रूप को समर्पित है, जिन्होंने पुराणों की कथा में समुद्र-मन्थन के बाद अमृत बाँटा। नगर के नीचे की भूमि इससे भी बहुत पुरानी है। डेक्कन कॉलेज के एच. डी. सांकलिया ने 1954–56 में यहाँ उत्खनन किया और लम्बी परम्परा पाई: प्रवरा की बजरी में पुराण-पाषाण युग के पत्थर के औज़ार, ताम्रपाषाण युग का खेतिहर गाँव, और सातवाहन काल का नगर जिसमें रोमन मृद्भाण्ड मिले। उनके द्वारा वर्णित मध्य पुराण-पाषाण उद्योग आज भी इसी स्थान के नाम पर नेवासियन कहलाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1290 ई. (शक 1212)रामचन्द्र यादव के राज्य में ज्ञानेश्वर नेवासा में ज्ञानेश्वरी पूर्ण करते हैं।
- 1954–56एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में डेक्कन कॉलेज का उत्खनन नगर की प्रागैतिहासिक और सातवाहन परतें खोलता है।
नेवासा अहिल्यानगर (अहमदनगर) से लगभग 60 किमी उत्तर-पूर्व में है; कार्तिकी एकादशी पर ज्ञानेश्वर मंदिर में भारी भीड़ रहती है।





