आज भी खड़ा

सिद्धिविनायक मन्दिर, सिद्धटेक

अष्टविनायकों में एकमात्र धाम, जहाँ गणेश की सूँड़ दाहिनी ओर मुड़ी है। मुद्गल पुराण कहता है कि भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ के वध से पहले यहीं सिद्धि पाई।

निर्माण: वर्तमान काले पत्थर का मन्दिर अहिल्याबाई होलकर ने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाया; नगारखाना पेशवा सेनापति हरिपन्त फड़के कास्थान: महाराष्ट्र (अहिल्यानगर ज़िला, कर्जत तालुका)देवता: श्री गणेश, दाहिनी ओर मुड़ी सूँड़ वाले सिद्धिविनायक रूप में18.44° N, 74.73° E
  1. 1939
  2. 1970
चित्र: Borayin Maitreya Larios · CC BY 2.0

01जहाँ विष्णु को सिद्धि मिली

मुद्गल पुराण कहता है कि सृष्टि के आरम्भ में, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए और ब्रह्मा के सृजन-कार्य में बाधा डालने लगे। विष्णु उनसे लड़े पर जीत न सके। महादेव ने कारण बताया: उन्होंने पहले गणेश का आवाहन नहीं किया था। तब विष्णु ने भीमा तट की इस टेकरी पर बैठकर गणेश-मन्त्र से उपासना की, सिद्धि पाई, फिर युद्ध में लौटकर दोनों का वध किया। टेकरी का नाम सिद्धटेक पड़ा। दाहिनी सूँड़ वाले गणेश शीघ्र वर देने वाले और उपासना में कठोर माने जाते हैं, इसीलिए यह धाम जागृत कहलाता है।

02भीमा तट पर अहिल्याबाई का मन्दिर

उत्तरमुखी मन्दिर बबूल से ढकी एक नीची पहाड़ी पर काले पत्थर से बना है। इन्दौर की अहिल्याबाई होलकर ने वर्तमान मन्दिर बनवाया। पेशवाओं के सेनापति हरिपन्त फड़के ने नगारखाना और पक्का मार्ग जोड़ा; मन्दिर का वृत्तान्त कहता है कि उन्होंने यहाँ इक्कीस दिन उपासना की, हर दिन पहाड़ी की इक्कीस परिक्रमाएँ कीं, और उन्हें अपना सेनापति-पद वापस मिला। चिंचवड के मोरया गोसावी को भी यहीं सिद्धि मिली, ऐसा स्मरण है। भक्त आज भी काँटेदार झाड़ियों के बीच कच्चे रास्ते से पूरी टेकरी की सात परिक्रमाएँ करते हैं। बड़ौदा के ज़मींदार मैराळ का बनवाया बाहरी सभामण्डप 1939 में गिराया गया और 1970 में फिर बना।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1939पुराना बाहरी सभामण्डप गिराया गया।
  2. 1970बाहरी सभामण्डप फिर से बना।
दर्शन और यात्रा

निकटतम रेलवे स्टेशन दौंड लगभग 19 किलोमीटर दूर है। दक्षिण तट के शिरापुर से नए पुल से भीमा पार करें; मन्दिर का प्रबन्ध चिंचवड देवस्थान ट्रस्ट करता है।