01छोटे साहिबज़ादे
दिसम्बर 1705 में जब आनन्दपुर छोड़ा गया, तो उफनती सरसा पर गुरु का परिवार बिखर गया। उनकी माता, माता गुजरी, और दोनों छोटे बालकों को एक पुराने सेवक गंगू ने आश्रय दिया और फिर मोरिंडा में मुग़ल अधिकारियों को सौंप दिया। उन्हें सरहिन्द लाकर पोह की ठण्ड में ठण्डे बुर्ज, एक खुली मीनार, में रखा गया। वज़ीर ख़ाँ की कचहरी में बालकों ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया। उन्हें जीवित दीवार में चुनवाया गया, और दीवार गिरने पर उनका वध कर दिया गया। समाचार सुनकर माता गुजरी ने बुर्ज में ही प्राण त्याग दिए। सिख परम्परा बताती है कि दीवान टोडर मल ने उनके दाह-संस्कार की भूमि उसे सोने की मोहरों से ढककर ख़रीदी।
02फ़तेहगढ़: विजय का गढ़
मई 1710 में बन्दा सिंह बहादुर की सेना ने चप्पड़ चिड़ी में वज़ीर ख़ाँ को हराया, जहाँ वह मारा गया, और सरहिन्द पर धावा बोला। चौवन वर्ष बाद, जनवरी 1764 में, दल ख़ालसा ने अहमद शाह अब्दाली के सूबेदार ज़ैन ख़ाँ को हराकर मार डाला और नगर को धूल में मिला दिया। बलिदान-स्थल का नाम छोटे बालक के नाम पर फ़तेहगढ़, विजय का गढ़, रखा गया। गुरुद्वारा 1840 के दशक में पटियाला के महाराजा करम सिंह के समय बना; भूमिगत भोरा साहिब में वह दीवार सुरक्षित है। कुछ दूर गुरुद्वारा ज्योति स्वरूप दादी और दोनों बालकों के दाह-संस्कार का स्थान है। हर दिसम्बर शहीदी जोड़ मेला लाखों लोगों को फ़तेहगढ़ साहिब लाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- दिसम्बर 1705सरहिन्द में साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह और साहिबज़ादा फ़तेह सिंह शहीद होते हैं; माता गुजरी ठण्डे बुर्ज में प्राण त्यागती हैं।
- मई 1710बन्दा सिंह बहादुर चप्पड़ चिड़ी में वज़ीर ख़ाँ को हराकर सरहिन्द लेते हैं।
- जनवरी 1764दल ख़ालसा अब्दाली के सूबेदार ज़ैन ख़ाँ को मारकर सरहिन्द को ढहा देता है।
- 1840 का दशकपटियाला के महाराजा करम सिंह गुरुद्वारा बनवाते हैं।
सरहिन्द रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किमी; शहीदी जोड़ मेला दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में होता है।






