लगभग आठ महीने की घेराबंदी में भूख से टूटकर बंदा सिंह और उनके साथी पकड़े गए।
01घेराबंदी
बादशाह फ़र्रुख़सियर ने लाहौर के सूबेदार को किसी भी मूल्य पर सिख उभार कुचलने का आदेश दिया। 1715 के वसंत में बंदा सिंह गुरदास नंगल में दुनी चंद की हवेली में घिर गए। मुग़लों ने चारों ओर खाइयाँ खोदीं और प्रतीक्षा की। रक्षकों ने अपने घोड़े खाए, फिर घास और छाल। दिसंबर 1715 में लड़ने में असमर्थ बचे हुए लोग पकड़ लिए गए।
02दिल्ली, 1716
बंदा सिंह और कई सौ सिखों को ज़ंजीरों में दिल्ली ले जाया गया। दिन-ब-दिन सिखों का वध हुआ, और उस समय दिल्ली में मौजूद अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों समेत समकालीन दर्शकों ने लिखा कि किसी ने धर्म छोड़कर प्राण बचाना स्वीकार नहीं किया। उनके छोटे पुत्र को उनकी आँखों के सामने मारने के बाद जून 1716 में बंदा सिंह का वध किया गया।

पहले सिख राज्य का अंत; खालसा जंगलों में बिखरा और एक पीढ़ी के भीतर मिसलों के रूप में लौटा।
