चोलों ने 1025 में बंगाल की खाड़ी पार बेड़ा भेजकर श्रीविजय पर प्रहार किया। शिवाजी ने समुद्री क़िले और लड़ाकू नौसेना बनाई, और आगे चलकर मराठा बेड़े के सरखेल कान्होजी आंग्रे ने 1729 में अपनी मृत्यु तक अंग्रेज़ों, पुर्तगालियों और डचों के विरुद्ध कोंकण तट थामे रखा।
प्रमाण
- राजेन्द्र चोल के शिलालेख 1025 के समुद्री अभियान में जीते गए श्रीविजय के बंदरगाहों की सूची देते हैं।
- शिवाजी ने 1664 में मालवण में सिंधुदुर्ग का समुद्री क़िला बनवाना शुरू किया।
- 1741 में त्रावणकोर के मार्तण्ड वर्मा ने कोलाचेल में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को हराया।
01लोथल से कुलाबा तक
गुजरात के लोथल में एस. आर. राव ने ईंटों का एक विशाल कुंड खोदा जिसे उन्होंने हड़प्पा युग की गोदी माना। सातवाहन सिक्कों पर दो मस्तूल वाले जहाज़ बने हैं। पल्लवों और चोलों के बंदरगाहों से चीन तक व्यापार होता था। सिद्दियों और पुर्तगालियों को अपने तट पर हावी देखकर शिवाजी ने कल्याण और भिवंडी में जहाज़ बनवाए और एक द्वीप पर सिंधुदुर्ग खड़ा किया। 1698 से मराठा बेड़े के सरखेल कान्होजी आंग्रे ने ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज़ पकड़े और 1721 में कुलाबा पर अंग्रेज़-पुर्तगाली संयुक्त आक्रमण को खदेड़ दिया। मुंबई में भारतीय नौसेना का ठिकाना आईएनएस आंग्रे उन्हीं के नाम पर है।
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श्रीविजय पर चोल नौसैनिक अभियान
राजेन्द्र ने बंगाल की खाड़ी के पार बेड़ा भेजा और मलक्का जलडमरूमध्य पर फैले श्रीविजय के समुद्री साम्राज्य पर प्रहार किया। किसी भारतीय राज्य का इतने विस्तार से दर्ज यह अकेला विदेशी नौसैनिक अभियान है।

छत्रपति शिवाजी महाराज
19 फ़रवरी 1630 को शिवनेरी में जन्मे शिवाजी ने पुणे के आसपास के मुट्ठी भर पहाड़ी दुर्गों से स्वतंत्र मराठा राज्य खड़ा किया, बीजापुर और मुग़लों को मात दी, औरंगज़ेब के दरबार से निकल आए, और 6 जून 1674 को रायगढ़ पर छत्रपति के रूप में अभिषिक्त हुए।

कुलचल (कोलाचल) का युद्ध
कुलचल में एक भारतीय राजा ने एक यूरोपीय कंपनी की सेना को खुले युद्ध में हराया और उसके अधिकारियों को बंदी बनाया।

लोथल
खम्भात की खाड़ी के पास हड़प्पाई बन्दरगाह नगर, जिसकी खुदाई एस. आर. राव ने 1955–60 में की, और जहाँ ईंटों के एक बेसिन को उन्होंने संसार का सबसे पुराना ज्ञात गोदी-घाट पहचाना।

मराठा छत्रपति (भोंसले)
शिवाजी भोंसले ने सह्याद्रि के पहाड़ी किलों से हिन्दू राज्य खड़ा किया और 1674 में रायगड पर छत्रपति के रूप में उनका राज्याभिषेक हुआ। उनके पुत्रों और पुत्रवधू ताराबाई ने औरंगज़ेब से सत्ताईस वर्ष के युद्ध में उसे बचाए रखा, और यही राज्य अठारहवीं शताब्दी में भारत के बड़े भाग पर छाने वाली मराठा शक्ति बना।