यह क्या कहता है
चार्ल्स मैसन ने 1820 के दशक में ये टीले देखे, और अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने यहाँ आकर 1875 में यहाँ की एक मुहर प्रकाशित की। तब तक रेल ठेकेदार लाहौर–मुल्तान लाइन के लिए टीलों की ईंटें ढो ले गए थे। 1921 में साहनी की खाइयों में वैसी ही मुहरें मिलीं जैसी बनर्जी मोहनजोदड़ो में पा रहे थे, और 1924 में मार्शल ने एक नई सभ्यता की घोषणा की। यहाँ खुदाई इस सदी तक चलती रही है।
इसी से भारत के सबसे पुराने नगरों की आधुनिक खोज शुरू हुई।









