01कपिलेन्द्र देव
कपिलेन्द्र अन्तिम गंग राजा के मन्त्री थे। 1434–35 में सत्ता लेकर उन्होंने बंगाल और जौनपुर के सुल्तानों को पीछे धकेला और फिर दक्षिण की ओर मुड़े। उनकी सेनाओं ने रेड्डियों से राजमहेन्द्री और कोण्डवीडु लिए, और उनके पुत्र हम्वीर कुछ समय के लिए कांची और तिरुचिरापल्ली तक पहुँचे। पुरी के जगन्नाथ मन्दिर पर लगवाया उनका अभिलेख अधिकारियों को न्याय से चलने का आदेश देता है, और भुवनेश्वर के लिंगराज पर एक अन्य अभिलेख उनके शासन को दर्ज करता है।
02कांची और प्रतापरुद्र
पुरुषोत्तम देव कांची के राजा से लड़े; ओड़िया परम्परा बताती है कि जगन्नाथ और बलभद्र दो घुड़सवारों के रूप में उनकी सेना के आगे चले, और वे साक्षी गोपाल का विग्रह और राजकुमारी पद्मावती लेकर लौटे। उनके पुत्र प्रतापरुद्र ने दक्षिणी भूमि कृष्णदेवराय के हाथ गँवाई, जिन्होंने 1514 में उदयगिरि और 1516 में कोण्डवीडु लिया; शान्ति विवाह से पक्की हुई। 1510 में चैतन्य महाप्रभु पुरी आए, और राजा उनके निष्ठावान अनुयायी बने।

03हिन्दू ओडिशा की स्वतन्त्रता का अन्त
प्रतापरुद्र की मृत्यु के एक वर्ष के भीतर उनके पुत्रों को उनके मन्त्री गोविन्द विद्याधर ने मार डाला, जिसने 1541 में भोई वंश की स्थापना की। बाद के राजा मुकुन्द देव अन्तिम स्वतन्त्र शासक थे; 1568 में बंगाल के अफगान करानी सुल्तानों के आक्रमण में वे गिरे, और उनके सेनापति कालापहाड़ ने पुरी और तट के मन्दिरों पर धावा बोला। गजपति उपाधि खुर्दा के भोई राजाओं को मिली, जिनके वंशज आज भी रथयात्रा पर छेरा पहँरा करते हैं।
शासक
- 1कपिलेन्द्र देवसंस्थापक; गंगा से कावेरी तक साम्राज्य1434–1467
- 2पुरुषोत्तम देवकांची अभियान1467–1497
- 3प्रतापरुद्र देवचैतन्य महाप्रभु के अनुयायी1497–1540
- 4कालुआ देव1540–1541
- 5कखारुआ देववंश के अन्तिम; मारे गए1541
उनकी विरासत
- जगन्नाथ और लिंगराज मन्दिरों पर कपिलेन्द्र के अभिलेख
- सारला दास का ओड़िया महाभारत, कपिलेन्द्र के राज्यकाल में रचा गया
- पुरी में गौड़ीय वैष्णव परम्परा, जो वहाँ चैतन्य के वर्षों से चली
- पुरी के पास साक्षी गोपाल मन्दिर







