વૈષ્ણવજન તો તેને રે કહીયે, જે પીડ પરાઈ જાણે રે.
પરદુઃખે ઉપકાર કરે તોયે, મન અભિમાન ન આણે રે.
સકળ લોકમાં સહુને વંદે, નિંદા ન કરે કેની રે.
વાચ કાછ મન નિશ્ચલ રાખે, ધન ધન જનની તેની રે.
સમદ્રષ્ટિને તૃષ્ણા ત્યાગી, પરસ્ત્રી જેને માત રે.
જિહ્વા થકી અસત્ય ન બોલે, પરધન નવ ઝાલે હાથ રે.
મોહ માયા વ્યાપે નહિ જેને, દ્રઢ વૈરાગ્ય જેના મનમાં રે.
રામ નામ શું તાળી રે વાગી, સકળ તિરથ તેના તનમાં રે.
વણલોભી ને કપટ રહિત છે, કામ ક્રોધ નિવાર્યા રે.
ભણે નરસૈયો તેનું દર્શન કરતા, કુળ ઈકોતેર તાર્યા રે.
वैष्णवजन तो तेने रे कहीये, जे पीड पराई जाणे रे.
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे.
सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे.
वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेनी रे.
समद्रष्टिने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे.
जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे.
मोह माया व्यापे नहि जेने, द्रढ वैराग्य जेना मनमां रे.
राम नाम शुं ताळी रे वागी, सकळ तिरथ तेना तनमां रे.
वणलोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे.
भणे नरसैयो तेनुं दर्शन करता, कुळ ईकोतेर तार्या रे.
Vaishnav jan to tene re kahiye, je peed parai jane re,
par dukhe upkar kare toye, man abhiman na ane re.
Sakal lok man sahune vande, ninda na kare keni re,
vach kachh man nishchal rakhe, dhan dhan janani teni re.
Samadrishti ne trishna tyagi, parstri jene mat re,
jihva thaki asatya na bole, pardhan nav jhale hath re.
Moh maya vyape nahi jene, dradh vairagya jena man man re,
Ram nam shun tali re vagi, sakal tirath tena tan man re.
Vanlobhi ne kapat rahit chhe, kam krodh nivarya re,
bhane Narsaiyo tenun darshan karta, kul ikoter tarya re.
अर्थ
वैष्णव उसी को कहिए जो दूसरों की पीड़ा को जानता है, दुखी का उपकार करता है और फिर भी मन में अभिमान नहीं आने देता।
जो संसार में सबको प्रणाम करता है, किसी की निंदा नहीं करता, वाणी, आचरण और मन को स्थिर रखता है: ऐसे व्यक्ति की माता धन्य है, धन्य है।
जो सबको समान दृष्टि से देखता है, तृष्णा का त्याग कर चुका है, पराई स्त्री जिसके लिए माता है, जिसकी जीभ असत्य नहीं बोलती और जिसका हाथ पराया धन नहीं छूता।
जिसे मोह और माया नहीं व्यापते, जिसके मन में दृढ़ वैराग्य है, जो राम-नाम में लीन हो गया है: सारे तीर्थ उसके शरीर में हैं।
जो लोभ-रहित और कपट-रहित है, जिसने काम और क्रोध को दूर कर दिया है: नरसिंह कहते हैं, ऐसे व्यक्ति के दर्शन से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं।
इस भजन के बारे में
जूनागढ़ के नरसिंह मेहता, गुजराती के आदिकवि, वैष्णव की पहचान तिलक या मंदिर से नहीं, आचरण से बताते हैं: जो दूसरे की पीड़ा अनुभव करे और उपकार करके अभिमान न करे। महात्मा गांधी ने इसे अपने आश्रम की प्रार्थना-पुस्तक का पहला भजन बनाया, और अंत तक उनकी प्रार्थना सभाओं में यह गाया जाता रहा, जिससे यह गुजरात से बहुत दूर तक पहुँचा। भारत के विद्यालयों और सार्वजनिक समारोहों में आज भी यह गाया जाता है। पाठ गुजराती विकिस्रोत पर छपे “भजन सार सिंधु” के प्रतिलेख के अनुसार है, जहाँ यह पद 117 है।
Bhajan Sar Sindhu, pada 117 (Gujarati Wikisource transcription)
