જળકમળ છાંડી જાને બાળા, સ્વામી અમારો જાગશે
જાગશે, તને મારશે, મને બાળ હત્યા લાગશે
કહે રે બાળક તું મારગ ભૂલ્યો, કે તારા વેરીએ વળાવિયો
નિશ્ચે તારો કાળ જ ખૂટ્યો, અહીંયા તે શીદ આવિયો
નથી નાગણ હું મારગ ભૂલ્યો, નથી મારા વેરીએ વળાવિયો
મથુરા નગરીમાં જુગટુ રમતાં, નાગનું શીશ હું હારિયો
રંગે રૂડો રૂપે પૂરો, દિસંતો કોડીલો કોડામણો,
તારી માતાએ કેટલા જનમ્યાં, તેમાં તું અળખામણો
મારી માતાએ બેઉ જનમ્યાં, તેમાં હું નટવર નાનડો
જગાડ તારા નાગને, મારું નામ કૃષ્ણ કહાનડો
લાખ સવાનો મારો હાર આપું, આપું રે તુજને દોરીઓ
એટલું મારા નાગથી છાનું આપું, કરીને તુજને ચોરીઓ
શું કરું નાગણ હાર તારો, શું કરું તારો દોરીઓ
શાને કાજે નાગણ તારે, કરવી ઘરમાં ચોરીઓ
ચરણ ચાંપી મૂછ મરડી, નાગણે નાગ જગાડિયો,
ઉઠોને બળવંત કોઈ, બારણે બાળક આવિયો
બેઉ બળિયા બાથે વળગિયા, શ્રીકૃષ્ણે કાળીનાગ નાથિયો
સહસ્ત્ર ફેણાં ફુંફવે જેમ, ગગન ગાજે હાથિયો
નાગણ સૌ વિલાપ કરે કે, નાગને બહુ દુઃખ આપશે
મથુરા નગરીમાં લઈ જશે, પછી નાગનું શીશ કાપશે
બેઉ કર જોડી વીનવે, સ્વામી ! મૂકો અમારા કંથને
અમે અપરાધી કાંઈ ન સમજ્યાં, ન ઓળખ્યાં ભગવંતને
થાળ ભરીને શગ મોતીડે, શ્રીકૃષ્ણને રે વધાવિયો
નરસૈંયાના નાથ પાસેથી, નાગણે નાગ છોડાવિયો
जळकमळ छांडी जाने बाळा, स्वामी अमारो जागशे
जागशे, तने मारशे, मने बाळ हत्या लागशे
कहे रे बाळक तुं मारग भूल्यो, के तारा वेरीए वळावियो
निश्चे तारो काळ ज खूट्यो, अहींया ते शीद आवियो
नथी नागण हुं मारग भूल्यो, नथी मारा वेरीए वळावियो
मथुरा नगरीमां जुगटु रमतां, नागनुं शीश हुं हारियो
रंगे रूडो रूपे पूरो, दिसंतो कोडीलो कोडामणो,
तारी माताए केटला जनम्यां, तेमां तुं अळखामणो
मारी माताए बेउ जनम्यां, तेमां हुं नटवर नानडो
जगाड तारा नागने, मारुं नाम कृष्ण कहानडो
लाख सवानो मारो हार आपुं, आपुं रे तुजने दोरीओ
एटलुं मारा नागथी छानुं आपुं, करीने तुजने चोरीओ
शुं करुं नागण हार तारो, शुं करुं तारो दोरीओ
शाने काजे नागण तारे, करवी घरमां चोरीओ
चरण चांपी मूछ मरडी, नागणे नाग जगाडियो,
उठोने बळवंत कोई, बारणे बाळक आवियो
बेउ बळिया बाथे वळगिया, श्रीकृष्णे काळीनाग नाथियो
सहस्त्र फेणां फुंफवे जेम, गगन गाजे हाथियो
नागण सौ विलाप करे के, नागने बहु दुःख आपशे
मथुरा नगरीमां लई जशे, पछी नागनुं शीश कापशे
बेउ कर जोडी वीनवे, स्वामी ! मूको अमारा कंथने
अमे अपराधी कांई न समज्यां, न ओळख्यां भगवंतने
थाळ भरीने शग मोतीडे, श्रीकृष्णने रे वधावियो
नरसैंयाना नाथ पासेथी, नागणे नाग छोडावियो
Jalkamal chhandi jane bala, svami amaro jagshe,
jagshe, tane marshe, mane bal hatya lagshe.
Kahe re balak tun marag bhulyo, ke tara veriye valaviyo,
nishche taro kal ja khutyo, ahinya te shid aviyo.
Nathi nagan hun marag bhulyo, nathi mara veriye valaviyo,
Mathura nagri man jugatun ramtan, nagnun shish hun hariyo.
Range rudo rupe puro, disanto kodilo kodamano,
tari matae ketla janamyan, teman tun alkhamano.
Mari matae beu janamyan, teman hun Natvar nanado,
jagad tara nagne, marun nam Krishna Kahanado.
Lakh savano maro har apun, apun re tujne dorio,
etlun mara nagthi chhanun apun, karine tujne chorio.
Shun karun nagan har taro, shun karun taro dorio,
shane kaje nagan tare, karvi ghar man chorio.
Charan chanpi muchh mardi, nagne nag jagadiyo,
uthone balvant koi, barne balak aviyo.
Beu baliya bathe valagiya, Shrikrishne Kalinag nathiyo,
sahastra phenan phunphave jem, gagan gaje hathiyo.
Nagan sau vilap kare ke, nagne bahu dukh apshe,
Mathura nagri man lai jashe, pachhi nagnun shish kapshe.
Beu kar jodi vinave, svami! muko amara kanthne,
ame aparadhi kanin na samajyan, na olakhyan Bhagvantne.
Thal bharine shag motide, Shrikrishnane re vadhaviyo,
Narsainyana nath pasethi, nagne nag chhodaviyo.
अर्थ
“हे बालक, जल और कमल छोड़कर चले जाओ! हमारे स्वामी जाग जाएँगे। वे जागेंगे और तुम्हें मार डालेंगे, और मुझे बालक की हत्या का पाप लगेगा।
बताओ बालक, क्या तुम रास्ता भूल गए, या किसी शत्रु ने तुम्हें यहाँ भेजा है? निश्चय ही तुम्हारा काल आ गया है, नहीं तो यहाँ क्यों आते?”
“नागिन, न मैं रास्ता भूला हूँ, न किसी शत्रु ने मुझे भेजा है। मथुरा नगरी में जुआ खेलते हुए मैं नाग का सिर हार गया हूँ।”
“तुम रंग से सुंदर हो, रूप से पूरे हो, बड़े प्यारे लगते हो। तुम्हारी माँ ने कितने बच्चे जने कि तुम ही अनचाहे निकले?”
“मेरी माँ ने दो को जन्म दिया, उनमें मैं छोटा नटवर हूँ। अपने नाग को जगाओ, मेरा नाम कृष्ण कन्हैया है।”
“मैं तुम्हें सवा लाख का अपना हार दूँगी, अपनी करधनी भी दूँगी; यह सब अपने नाग से छिपाकर, चोरी से दूँगी।”
“नागिन, मैं तुम्हारे हार का क्या करूँ, तुम्हारी करधनी का क्या करूँ? तुम अपने ही घर में चोरी क्यों करो?”
पैर दबाकर, मूँछ मरोड़कर नागिन ने नाग को जगाया: “हे बलवान, उठो! द्वार पर एक बालक आया है।”
दोनों बलवान भिड़ गए; श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को नाथ लिया। उसके हज़ार फन फुफकारने लगे, और आकाश हाथी की चिंघाड़ जैसा गरज उठा।
सारी नागिनें विलाप करने लगीं: “यह हमारे नाग को बहुत दुख देगा, उसे मथुरा ले जाएगा और फिर उसका सिर काट देगा।”
दोनों हाथ जोड़कर वे विनती करने लगीं: “हे स्वामी, हमारे पति को छोड़ दीजिए। हम अपराधी हैं, हम कुछ समझ न सकीं, भगवान को पहचान न सकीं।”
थाल में मोती भरकर उन्होंने श्रीकृष्ण का स्वागत किया; और नरसिंह के नाथ से नागिनों ने अपने नाग को छुड़ा लिया।
इस भजन के बारे में
भागवत की कालिय-दमन लीला, जिसे नरसिंह मेहता यमुना के किनारे की एक जीवंत बातचीत की तरह कहते हैं। नाग की पत्नियाँ छोटे बालक को लौटाने की कोशिश करती हैं, उसे गहने देती हैं, और बाद में समझती हैं कि वे किसे डाँट रही थीं। गुजराती बच्चे इसे विद्यालय में सुनाते हैं, और नवरात्रि में यह गरबे के रूप में नाचा जाता है। पाठ गुजराती विकिस्रोत पर “नागदमन” शीर्षक से दिए रूप के अनुसार है।
Narsinh Mehta, Nagdaman; text as on Gujarati Wikisource (version given there; also in Bruhad Kavyadohan, vol. 1)
