અખિલ બ્રહ્માંડમાં એક તું શ્રીહરિ,
જૂજવે રૂપે અનંત ભાસે;
દેહમાં દેવ તું, તેજમાં તત્વ તું,
શૂન્યમાં શબ્દ થઈ વેદ વાસે.
પવન તું, પાણી તું, ભૂમિ તું ભૂધરા,
વૃક્ષ થઈ ફૂલી રહ્યો આકાશે;
વિવિધ રચના કરી અનેક રસ ચાખવા,
શિવ થકી જીવ થયો એ જ આશે.
વેદ તો એમ વદે શ્રુતિ-સ્મૃતિ શાખ દે,
કનક કુંડલ વિષે ભેદ ન હોયે;
ઘાટ ઘડિયા પછી નામરૂપ જૂજવાં,
અંતે તો હેમનું હેમ હોયે.
ગ્રંથે ગડબડ કરી, વાત ન ખરી કહી,
જેહને જે ગમે તેને તે પૂજે;
મન-વચન-કર્મથી આપ માની લહે,
સત્ય છે એ જ મન એમ સૂઝે.
વૃક્ષમાં બીજ તું, બીજમાં વૃક્ષ તું,
જોઉં પટંતરો એ જ પાસે;
ભણે નરસૈંયો એ મન તણી શોધના,
પ્રીત કરું પ્રેમથી પ્રગટ થાશે.
अखिल ब्रह्मांडमां एक तुं श्रीहरि,
जूजवे रूपे अनंत भासे;
देहमां देव तुं, तेजमां तत्व तुं,
शून्यमां शब्द थई वेद वासे.
पवन तुं, पाणी तुं, भूमि तुं भूधरा,
वृक्ष थई फूली रह्यो आकाशे;
विविध रचना करी अनेक रस चाखवा,
शिव थकी जीव थयो ए ज आशे.
वेद तो एम वदे श्रुति-स्मृति शाख दे,
कनक कुंडल विषे भेद न होये;
घाट घडिया पछी नामरूप जूजवां,
अंते तो हेमनुं हेम होये.
ग्रंथे गडबड करी, वात न खरी कही,
जेहने जे गमे तेने ते पूजे;
मन-वचन-कर्मथी आप मानी लहे,
सत्य छे ए ज मन एम सूझे.
वृक्षमां बीज तुं, बीजमां वृक्ष तुं,
जोउं पटंतरो ए ज पासे;
भणे नरसैंयो ए मन तणी शोधना,
प्रीत करुं प्रेमथी प्रगट थाशे.
Akhil brahmand man ek tun Shrihari,
jujave rupe anant bhase;
deh man dev tun, tej man tattva tun,
shunya man shabda thai Ved vase.
Pavan tun, pani tun, bhumi tun bhudhara,
vriksh thai phuli rahyo akashe;
vividh rachna kari anek ras chakhva,
Shiv thaki jiv thayo e ja ashe.
Ved to em vade shruti-smriti shakh de,
kanak kundal vishe bhed na hoye;
ghat ghadiya pachhi namrup jujavan,
ante to hem nun hem hoye.
Granthe gadbad kari, vat na khari kahi,
jehne je game tene te puje;
man-vachan-karmathi ap mani lahe,
satya chhe e ja man em sujhe.
Vriksh man bij tun, bij man vriksh tun,
joun patantaro e ja pase;
bhane Narsainyo e man tani shodhana,
prit karun premthi pragat thashe.
अर्थ
सारे ब्रह्मांड में एक आप ही श्रीहरि हैं, जो अलग-अलग रूपों में अनंत होकर दिखते हैं। शरीर में देवता आप हैं, तेज में तत्त्व आप हैं, शून्य में शब्द बनकर वेद रूप में आप ही बसते हैं।
पवन आप हैं, पानी आप हैं, हे धरणीधर, भूमि आप हैं; वृक्ष बनकर आप आकाश में फूल रहे हैं। अनेक रस चखने के लिए आपने यह विविध रचना की; इसी इच्छा से शिव से जीव बना।
वेद यही कहते हैं और श्रुति-स्मृति साक्षी देती हैं कि सोने और सोने के कुंडल में कोई भेद नहीं। गढ़े जाने के बाद नाम और रूप अलग हो जाते हैं, पर अंत में सोना तो सोना ही रहता है।
ग्रंथों ने गड़बड़ कर दी और सीधी बात नहीं कही: जिसे जो अच्छा लगता है वह उसी को पूजता है, और मन, वचन और कर्म से उसी को मानकर समझता है कि यही सत्य है।
वृक्ष में बीज आप हैं और बीज में वृक्ष आप; देखता हूँ तो अंतर यहीं पास में है। नरसिंह कहते हैं: यह मन की खोज है; प्रेम से प्रीति करूँ तो वे प्रकट होंगे।
इस भजन के बारे में
नरसिंह मेहता के प्रभातिये झूलणा छंद में भोर के गीत हैं, जो गुजराती घरों में घर जागते समय गाए जाते हैं। यह उनमें सबसे दार्शनिक है: सुनार के बिंब से कहा गया अद्वैत, कुंडल और कंगन जो केवल सोना हैं, और बीज-वृक्ष जो एक-दूसरे में समाए हैं। चौथा छंद ग्रंथों और संप्रदायों पर झगड़ने से सावधान करता है। पाठ गुजराती विकिस्रोत पर दिए रूप के अनुसार है; छपे संस्करणों में शब्दों का थोड़ा भेद मिलता है।
Narsinh Mehta, prabhatiyu; text as on Gujarati Wikisource (variant version given there)
