जें का रंजलें गांजलें। त्यासि म्हणे जो आपुलें॥१॥
तो चि साधु ओळखावा। देव तेथें चि जाणावा॥ध्रु.॥
मृदु सबाह्य नवनीत। तैसें सज्जनाचें चित्त॥२॥
ज्यासि आपंगिता नाहीं। त्यासि धरी जो हृदयीं॥३॥
दया करणें जें पुत्रासी। ते चि दासा आणि दासी॥४॥
तुका म्हणे सांगूं किती। तो चि भगवंताची मूर्ती॥५॥
Je ka ranjale ganjale, tyasi mhane jo apule.
To chi sadhu olakhava, dev tethe chi janava.
Mridu sabahya navanit, taise sajjanache chitta.
Jyasi apangita nahi, tyasi dhari jo hridayi.
Daya karane je putrasi, te chi dasa ani dasi.
Tuka mhane sangu kiti, to chi Bhagvantachi murti.
अर्थ
जो दुखी और सताए हुए लोगों को अपना कहता है,
उसी को सच्चा साधु पहचानो; भगवान वहीं हैं, ऐसा जानो।
जैसे माखन भीतर और बाहर दोनों ओर से कोमल होता है, वैसा ही सज्जन का मन होता है।
जिनका कोई सहारा नहीं, उन्हें जो हृदय से लगा लेता है,
जो दास और दासी पर भी वैसी ही दया करता है जैसी अपने पुत्र पर,
तुका कहते हैं, और कितना कहूँ: वही भगवान की मूर्ति है।
इस भजन के बारे में
तुकाराम की साधु की परख: उसका वस्त्र या विद्या नहीं, बल्कि यह कि वह घायलों और बेसहारों को अपना मानता है या नहीं। उत्तर इतना सीधा और इतना आत्मीय है कि महाराष्ट्र में जहाँ भी सेवा की बात होती है, गणेशोत्सव मंडलों से अस्पतालों तक, यह अभंग उद्धृत होता है। माखन का बिंब तुकाराम का श्रेष्ठ रूप है: देहू का किसान-पुत्र रसोई में भगवान को पाता हुआ।
Tukaram Gatha, abhang 347 (numbering as on Marathi Wikisource)
