ఎందరో మహానుభావు లందరికి వందనము
చందురు వర్ణుని యంద చందమును హృదయా
రవిందమునఁ జూచి బ్రహ్మానంద మనుభవించు వా రెందరో
సామగానలోల మనసిజ లావణ్య ధన్యమూర్ధన్యు లెందరో
మానస వనచర వర సంచారము సలిపి
మూర్తి బాగుగఁ బొడగనెడు వా రెందరో
సరగున పాదములకు స్వాంతమను
సరోజమును సమర్పణము సేయు వా రెందరో
పతితపావనుఁడనే పరాత్పరుని గురించి
పరమార్థమగు నిజమార్గముతోను బాడుచును
సల్లాపముతో స్వరలయాది రాగములఁ దెలియు వా రెందరో
హరిగుణ మణిమయ సరములు గళమున
శోభిల్లు భక్తకోటు లిలలో
తెలివితోఁ జెలిమితోఁ గరుణ గల్గి
జగమెల్లను సుధా దృష్టిచే బ్రోచు వా రెందరో
హొయలుమీర నడలు గల్గు సరసుని
సదా కనులఁ జూచుచును
పులక శరీరులై యానంద పయోధి
నిమగ్నులై ముదంబునను యశము గల వా రెందరో
పరమ భాగవత మౌనివర శశి విభాకర సనక సనందన
దిగీశ సుర కింపురుష కనకకశిపు సుత నారద తుంబురు
పవనసూను బాలచంద్రధర శుక సరోజభవ భూసురవరులు
పరమపావనులు ఘనులు శాశ్వతులు కమలభవ సుఖము సదానుభవులు గాక ఎందరో
నీ మేను నామ వైభవంబులను నీ పరాక్రమ ధైర్యముల
శాంత మానసము నీవులను వచన సత్యమును
రఘువర నీయెడ సద్భక్తియు జనించకను దుర్మతములను
కల్ల జేసినట్టి నీమది నెఱింగి సంతతంబునను
గుణ భజనానంద కీర్తనము జేయు వా రెందరో
భాగవత రామాయణ గీతాది శ్రుతి శాస్త్ర పురాణపు మర్మములన్
శివాది షణ్మతముల గూఢముల ముప్పదిముక్కోటి సురాంతరంగముల
భావంబుల నెఱిఁగి భావ రాగ లయాది సౌఖ్యముచే
చిరాయువుల్ గలిగి నిరవధి సుఖాత్ములై త్యాగరాజాప్తులైన వా రెందరో
ప్రేమ ముప్పిరి గొను వేళ నామము దలచువారు
రామభక్తుఁడైన త్యాగరాజనుతుని నిజదాసులైన వా రెందరో
ऎंदरो महानुभावु लंदरिकि वंदनमु
चंदुरु वर्णुनि यंद चंदमुनु हृदया
रविंदमुनँ जूचि ब्रह्मानंद मनुभविंचु वा रॆंदरो
सामगानलोल मनसिज लावण्य धन्यमूर्धन्यु लॆंदरो
मानस वनचर वर संचारमु सलिपि
मूर्ति बागुगँ बॊडगनॆडु वा रॆंदरो
सरगुन पादमुलकु स्वांतमनु
सरोजमुनु समर्पणमु सेयु वा रॆंदरो
पतितपावनुँडने परात्परुनि गुरिंचि
परमार्थमगु निजमार्गमुतोनु बाडुचुनु
सल्लापमुतो स्वरलयादि रागमुलँ दॆलियु वा रॆंदरो
हरिगुण मणिमय सरमुलु गळमुन
शोभिल्लु भक्तकोटु लिललो
तॆलिवितोँ जॆलिमितोँ गरुण गल्गि
जगमॆल्लनु सुधा दृष्टिचे ब्रोचु वा रॆंदरो
हॊयलुमीर नडलु गल्गु सरसुनि
सदा कनुलँ जूचुचुनु
पुलक शरीरुलै यानंद पयोधि
निमग्नुलै मुदंबुननु यशमु गल वा रॆंदरो
परम भागवत मौनिवर शशि विभाकर सनक सनंदन
दिगीश सुर किंपुरुष कनककशिपु सुत नारद तुंबुरु
पवनसूनु बालचंद्रधर शुक सरोजभव भूसुरवरुलु
परमपावनुलु घनुलु शाश्वतुलु कमलभव सुखमु सदानुभवुलु गाक ऎंदरो
नी मेनु नाम वैभवंबुलनु नी पराक्रम धैर्यमुल
शांत मानसमु नीवुलनु वचन सत्यमुनु
रघुवर नीयॆड सद्भक्तियु जनिंचकनु दुर्मतमुलनु
कल्ल जेसिनट्टि नीमदि नॆऱिंगि संततंबुननु
गुण भजनानंद कीर्तनमु जेयु वा रॆंदरो
भागवत रामायण गीतादि श्रुति शास्त्र पुराणपु मर्ममुलन्
शिवादि षण्मतमुल गूढमुल मुप्पदिमुक्कोटि सुरांतरंगमुल
भावंबुल नॆऱिँगि भाव राग लयादि सौख्यमुचे
चिरायुवुल् गलिगि निरवधि सुखात्मुलै त्यागराजाप्तुलैन वा रॆंदरो
प्रेम मुप्पिरि गॊनु वेळ नाममु दलचुवारु
रामभक्तुँडैन त्यागराजनुतुनि निजदासुलैन वा रॆंदरो
endarō mahānubhāvu landariki vandanamu
canduru varṇuni yanda candamunu hṛdayā
ravindamuna jūci brahmānanda manubhaviñcu vā rendarō
sāmagānalōla manasija lāvaṇya dhanyamūrdhanyu lendarō
mānasa vanacara vara sañcāramu salipi
mūrti bāguga boḍaganeḍu vā rendarō
saraguna pādamulaku svāntamanu
sarōjamunu samarpaṇamu sēyu vā rendarō
patitapāvanuḍanē parātparuni guriñci
paramārthamagu nijamārgamutōnu bāḍucunu
sallāpamutō svaralayādi rāgamula deliyu vā rendarō
hariguṇa maṇimaya saramulu gaḷamuna
śōbhillu bhaktakōṭu lilalō
telivitō jelimitō garuṇa galgi
jagamellanu sudhā dṛṣṭicē brōcu vā rendarō
hoyalumīra naḍalu galgu sarasuni
sadā kanula jūcucunu
pulaka śarīrulai yānanda payōdhi
nimagnulai mudambunanu yaśamu gala vā rendarō
parama bhāgavata maunivara śaśi vibhākara sanaka sanandana
digīśa sura kimpuruṣa kanakakaśipu suta nārada tumburu
pavanasūnu bālacandradhara śuka sarōjabhava bhūsuravarulu
paramapāvanulu ghanulu śāśvatulu kamalabhava sukhamu sadānubhavulu gāka endarō
nī mēnu nāma vaibhavambulanu nī parākrama dhairyamula
śānta mānasamu nīvulanu vacana satyamunu
raghuvara nīyeḍa sadbhaktiyu janiñcakanu durmatamulanu
kalla jēsinaṭṭi nīmadi neṟiṅgi santatambunanu
guṇa bhajanānanda kīrtanamu jēyu vā rendarō
bhāgavata rāmāyaṇa gītādi śruti śāstra purāṇapu marmamulan
śivādi ṣaṇmatamula gūḍhamula muppadimukkōṭi surāntaraṅgamula
bhāvambula neṟigi bhāva rāga layādi saukhyamucē
cirāyuvul galigi niravadhi sukhātmulai tyāgarājāptulaina vā rendarō
prēma muppiri gonu vēḷa nāmamu dalacuvāru
rāmabhaktuḍaina tyāgarājanutuni nijadāsulaina vā rendarō
अर्थ
पल्लवी: महान आत्माएँ अनगिनत हैं; उन सबको मेरा वंदन।
अनुपल्लवी: जो हृदय-कमल में प्रभु के चन्द्रमा-से सुन्दर रूप को देखकर ब्रह्मानन्द का अनुभव करते हैं।
1. सामगान-प्रेमी, कामदेव से भी अधिक लावण्यमय प्रभु के प्रेमी, धन्य जनों में श्रेष्ठ।
2. जो मन रूपी वनचर का भटकना रोककर प्रभु की मूर्ति का स्पष्ट दर्शन करते हैं।
3. जो तुरंत अपना हृदय-कमल उनके चरणों में अर्पित कर देते हैं।
4. जो पतितपावन परात्पर प्रभु का परमार्थ के सच्चे मार्ग से गुणगान करते हैं, और प्रेमालाप के साथ स्वर-लय सहित रागों को जानते हैं।
5. पृथ्वी के वे भक्तगण जिनके कंठ में हरि के गुणों की मणिमालाएँ शोभती हैं, जो ज्ञान, मैत्री और करुणा से अमृत-दृष्टि द्वारा सारे जगत की रक्षा करते हैं।
6. जो मनोहर चाल वाले रसिक प्रभु को सदा आँखों से निहारते हैं, पुलकित शरीर से आनन्द-सागर में डूबे, हर्ष और यश से भरे रहते हैं।
7. परम भागवत, मुनिश्रेष्ठ, चन्द्र और सूर्य, सनक-सनन्दन, दिक्पाल, देव, किंपुरुष, हिरण्यकशिपु-पुत्र प्रह्लाद, नारद, तुम्बुरु, पवनपुत्र हनुमान, बालचन्द्रधारी शिव, शुकदेव, ब्रह्मा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, ये परम पावन, महान, शाश्वत, सदा ब्रह्मानन्द भोगने वाले हैं; इनके अतिरिक्त भी कितने ही हैं!
8. हे रघुवर, जो तुम्हारे उस मन को जानते हैं जिसने सद्भक्ति को जन्म न लेने देने वाले कुमतों को मिथ्या कर दिया, और जो तुम्हारे रूप, नाम-वैभव, पराक्रम, धैर्य, शान्त मन और सत्य वचन का सदा आनन्द से कीर्तन करते हैं।
9. जो भागवत, रामायण, गीता, श्रुति, शास्त्र और पुराणों के मर्म, शैव आदि छह मतों के गूढ़ अर्थ और तैंतीस कोटि देवताओं के अन्तर्मन के भाव जानते हैं; भाव, राग और लय के सुख से दीर्घायु होकर अनन्त सुख में रहते हैं और त्यागराज के प्रभु के प्रिय हैं।
10. जो प्रेम के तिगुना उमड़ने पर नाम का स्मरण करते हैं, रामभक्त त्यागराज द्वारा वन्दित प्रभु के सच्चे दास।
इस भजन के बारे में
हर जनवरी तिरुवैयारु में कावेरी का किनारा गायकों से भर जाता है, प्रसिद्ध भी और अनजान भी, जो त्यागराज की समाधि के सामने कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं। आराधना के दिन वे घनराग के पाँचों पञ्चरत्न एक साथ गाते हैं, और एन्दरो महानुभावुलु अंतिम है। इसमें त्यागराज राम से कुछ नहीं माँगते। वे हर उस जन को प्रणाम करते हैं जिसने राम से प्रेम किया: प्रह्लाद, नारद, हनुमान, शुकदेव, ऋषिगण, और वे असंख्य अनाम भक्त जो राग और लय के ज्ञान के साथ गाते हैं। शिष्य-परम्परा कहती है कि उन्होंने यह कृति तब गाई जब केरल के महान गायक षट्काल गोविन्द मारार उन्हें सुनने आए; यह परम्परा का कथन है। इसकी पहली पंक्ति आज भी रसिकों के प्रति संगीतज्ञों का प्रणाम बन गई है।
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