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विजयासन पेरुमाळ् मन्दिर, तिरुवरगुणमंगै (नत्तम्)

नव तिरुपति में दूसरा, श्रीवैकुण्ठम् से दो किलोमीटर, जहाँ विष्णु विजयी रूप में बैठे हैं। नवग्रह गणना में यह चन्द्र का मन्दिर है।

निर्माण: ताम्रपर्णी तट का पाण्ड्य-कालीन धामस्थान: तमिलनाडु (तूत्तुक्कुडि ज़िला)देवता: विजयासन पेरुमाळ्, आदिशेष के फण के नीचे बैठे; तायार् वरगुणवल्ली8.64° N, 77.92° E
  1. आळ्वार काल
चित्र: Ssriram mt · CC BY-SA 4.0

01माता-पिता की सेवा करने वाला ऋषि

मन्दिर की कथा ताम्रपर्णी तट के ब्राह्मण वेदवित् की है, जिन्होंने वृद्ध माता-पिता की मृत्युपर्यन्त सेवा की और तब तप की ओर मुड़े। भगवान वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए और उन्हें वरगुणमंगै भेजा। लम्बे तप के बाद भगवान विजय-आसन में बैठे प्रकट हुए, और वेदवित् ने उनसे उसी रूप में रहने की प्रार्थना की। दूसरी कथा ऋषि रोमश का नाम लेती है। नम्माळ्वार ने एक ही पाशुर में वरगुणमंगै का नाम लिया, श्रीवैकुण्ठम् और पुळिंगुडि के साथ।

02छोटा मन्दिर

मन्दिर छोटा है: आयताकार ग्रेनाइट प्राकार, पाँच तल का गोपुर, आगे सोलह स्तम्भों का मण्डप, और गर्भगृह में दोनों देवियों के साथ बैठे भगवान। नाम प्रायः पाण्ड्य राजा वरगुण से जोड़ा जाता है, यद्यपि यह सम्बन्ध निश्चित नहीं। मार्गऴि की वैकुण्ठ एकादशी मुख्य उत्सव है, और उत्सव-मूर्ति वैकासि के गरुड़ सेवै के लिए आऴ्वार्तिरुनगरि जाती है। पूजा तेन्कलै परम्परा और पाञ्चरात्र आगम से होती है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. आळ्वार कालनम्माळ्वार तिरुवाय्मोऴि में वरगुणमंगै का नाम लेते हैं।
दर्शन और यात्रा

नत्तम् में, श्रीवैकुण्ठम् से लगभग 2 किमी पूर्व।