01गोपाद्रि और ज्येष्ठेश्वर
कल्हण राजतरंगिणी की प्रथम तरंग में लिखते हैं कि राजा गोपादित्य ने गोपाद्रि पर्वत पर ब्राह्मणों को भूमि दी और वहाँ शिव ज्येष्ठेश्वर का देवालय प्रतिष्ठित किया। आज का मन्दिर ऊँचे अष्टकोणीय चबूतरे पर चौकोर देवालय है, जहाँ पत्थर की सीढ़ियाँ जाती हैं, और पुरातत्त्वविद वर्तमान संरचना को लगभग 9वीं शताब्दी का मानते हैं। बाद में फ़ारसी लेखकों ने पहाड़ी को तख़्त-ए-सुलैमान कहा। कश्मीरी पण्डितों के लिए यह सदा शंकराचार्य पर्वत रहा है।
02कश्मीर में शंकर
कश्मीरी परम्परा मानती है कि आदि शंकराचार्य दिग्विजय के समय इस पहाड़ी पर रहे, यहीं शिव के साथ शक्ति की उपासना की ओर आए, और सौन्दर्य लहरी की प्रेरणा यहीं मिली। देवालय के नीचे एक छोटी गुफा उनके ध्यान-स्थान के रूप में दिखाई जाती है। डोगरा राज्य के संस्थापक महाराजा गुलाब सिंह ने मन्दिर तक पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाईं। महाशिवरात्रि और श्रावण में सीढ़ियाँ भरी रहती हैं, और अमरनाथ की छड़ी मुबारक गुफा जाते हुए यहाँ पूजा के लिए रुकती है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 9वीं शताब्दीगोपाद्रि पर्वत पर वर्तमान पाषाण मन्दिर बना।
- 1846 के बादमहाराजा गुलाब सिंह देवालय तक पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाते हैं।
बुलेवार्ड से सड़क सुरक्षा द्वार तक जाती है; फिर लगभग 240 सीढ़ियाँ। द्वार के आगे प्रायः फ़ोन और कैमरा नहीं ले जाने दिए जाते।




