01नन्द के घर जन्म
देवी माहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय में देवी देवताओं से आने वाले समय की बात कहती हैं: वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में वे नन्दगोप के घर, यशोदा के गर्भ से जन्म लेंगी और विन्ध्याचलनिवासिनी बनकर विन्ध्य पर्वत पर रहेंगी। उस रात की कथा भागवत पुराण कहता है। वसुदेव नवजात कृष्ण को गोकुल ले गए और यशोदा की कन्या को कारागार में ले आए। कंस ने कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में अष्टभुजा रूप में प्रकट हुई और चेताया कि तुम्हें मारने वाला जन्म ले चुका है। भक्त मानते हैं कि वही देवी विन्ध्याचल में आकर विराजीं।
02त्रिकोण और सूचियाँ
विन्ध्याचल में यात्री त्रिकोण परिक्रमा करते हैं: नगर में महालक्ष्मी रूप में विन्ध्यवासिनी, लगभग 8 किमी दूर पहाड़ी पर महासरस्वती रूप में अष्टभुजा, और काली खोह की गुफा में महाकाली। चैत्र और आश्विन के नवरात्र में तीनों धाम भर जाते हैं, और वर्षा ऋतु की कजरी उन्हीं के नाम गाई जाती है। देवी भागवत पुराण देवी की 108 पीठों की सूची में विन्ध्य पर विन्ध्यवासिनी का नाम लेता है। पीठनिर्णय तन्त्र की 51 शक्तिपीठों की सूची में यह नाम नहीं है; वहाँ इसे सिद्ध पीठ माना जाता है, जहाँ देवी अपने पूर्ण रूप में विराजती हैं। परम्पराएँ भिन्न हैं, और नगर उन्हें शक्तिपीठों में ही गिनता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1 अगस्त 2021विन्ध्य गलियारे की आधारशिला रखी जाती है और अष्टभुजा व काली खोह पहाड़ियों के बीच रोपवे आरम्भ होता है।
प्रयागराज–मिर्ज़ापुर रेल मार्ग पर विन्ध्याचल स्टेशन मन्दिर से लगभग एक किलोमीटर है; वाराणसी हवाई अड्डा लगभग 70 किमी। घाट पर स्नान करके जाएँ, और नवरात्र में भोर में पहुँचें।




