01स्तम्भ क्या कहता है
अभिलेख गुप्त राजाओं की वंशावली से आरम्भ होकर स्कन्दगुप्त के अपने संकट की बात करता है। यह कहता है कि जब उनके कुल का भाग्य डगमगाया, तो उन्होंने नंगी भूमि पर लेटकर एक रात बिताई, और फिर पुष्यमित्रों को हराया। विजयी लौटकर वे अपनी विधवा माता के पास गए, जैसे शत्रुओं का वध कर कृष्ण देवकी के पास गए थे। जब वे युद्ध में हूणों से भिड़े तो धरती काँप उठी। अभिलेख इस उल्लेख के साथ समाप्त होता है कि उन्होंने धनुर्धारी शार्ङ्गी रूप में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की और उसकी पूजा के लिए गाँव दान दिया। ऊपर से टूटा स्तम्भ आज भी गाँव के पास एक खेत में खड़ा है।
02मुद्रा और खण्डहर
अलेक्ज़ेण्डर कनिंघम ने 1860 के दशक में स्तम्भ की सूचना दी, और 1888 में जे. एफ़. फ़्लीट ने अभिलेख का सम्पादन किया। स्तम्भ के चारों ओर गुप्तकालीन बस्ती के ईंटों के टीले और एक मन्दिर के अवशेष हैं। भितरी से मिली चाँदी-ताँबे की एक मुद्रा गुप्त और घटोत्कच से लेकर नरसिंहगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त तृतीय तक के राजाओं के नाम देती है, और उत्तरवर्ती गुप्तों का क्रम तय करने में इसका योगदान स्तम्भ जितना ही है। भितरी सैदपुर से कुछ किलोमीटर, वाराणसी और ग़ाज़ीपुर के बीच गंगा के पास है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 455–467 ई.स्कन्दगुप्त स्तम्भ खड़ा करते हैं और विष्णु प्रतिमा स्थापित करते हैं।
- 1888फ़्लीट कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इण्डिकेरम, खण्ड III में भितरी स्तम्भ अभिलेख प्रकाशित करते हैं।





