01सिन्ध की गद्दी
चचनामा, एक पुराने अरबी इतिहास का 13वीं शताब्दी का फ़ारसी अनुवाद, अरोड़ को सिन्ध के राय वंश की राजधानी बताता है। राय सहसी द्वितीय की मृत्यु पर उनके ब्राह्मण मन्त्री चच ने विधवा रानी से विवाह कर गद्दी ली; अरोड़ से वे और फिर उनके पुत्र दाहिर ने देबल के समुद्र से मुल्तान और कश्मीर की सीमा तक फैले राज्य पर शासन किया। 640 के दशक में सिन्ध से गुज़रे चीनी यात्री ह्वेनसांग ने राजधानी में अनेक बौद्ध विहारों और देव-मन्दिरों तथा शूद्र वर्ण के राजा का वर्णन किया है, जो चच से पहले के राय वंश से मेल खाता है।
02पतन, और नदी जो चली गई
712 में दाहिर रावर के पास वीरगति को प्राप्त हुए। उनका पुत्र कुछ समय अरोड़ में डटा रहा, पर चचनामा कहता है कि राजा की मृत्यु का समाचार सुनकर नगर ने मुहम्मद बिन क़ासिम के लिए फाटक खोल दिए। अरब शासन में अरोड़ महत्वपूर्ण नगर बना रहा। लगभग 10वीं शताब्दी में सिन्धु नदी पश्चिम की ओर हट गई, नगर का जल छिन गया, और लोग रोहड़ी और सक्खर जा बसे। आज अरोड़ गाँव के ऊपर की पहाड़ी पर टूटी दीवारें हैं, और पहाड़ी पर कालका देवी का मन्दिर है जहाँ सिन्धी हिन्दू आज भी जाते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 641ह्वेनसांग सिन्ध की राजधानी आते हैं।
- 7वीं शताब्दीराय राजाओं के मन्त्री चच अरोड़ की गद्दी लेते हैं।
- 712–713दाहिर की मृत्यु के बाद अरोड़ मुहम्मद बिन क़ासिम के हाथ गिरता है।





