01चारणों की आवड़
तनोट माता आवड़ माता हैं, मामड़िया चारण की पुत्री, जिनके बारे में चारण परम्परा कहती है कि वे सन्तान के लिए सात बार पैदल हिंगलाज गए और वर पाया कि देवी स्वयं उनके घर जन्म लेंगी। चारण उन्हें अपने समाज में जन्मी देवियों की उस परम्परा में गिनते हैं जो देशनोक की करणी माता तक जाती है, और उन्हें हिंगलाज का ही रूप मानते हैं। तनोट जैसलमेर के भाटी राजपूतों का पुराना ठिकाना था, और भाटी शासकों ने उन्हें अपनी देवी के रूप में पूजा।
021965 और लोंगेवाला
1965 के युद्ध में पाकिस्तानी तोपख़ाने ने तनोट क्षेत्र पर भारी गोलाबारी की। सैनिकों और गाँव वालों ने गोलों को मन्दिर में और उसके आसपास गिरते और न फटते देखा; कई गोले मन्दिर के संग्रहालय में रखे हैं। युद्ध के बाद सीमा सुरक्षा बल ने मन्दिर की देखरेख सँभाली, और उसके जवान आज तक आरती करते हैं। दिसम्बर 1971 में पास ही लोंगेवाला की लड़ाई हुई, और मन्दिर परिसर में विजय स्तम्भ खड़ा किया गया। सीमा के इस हिस्से पर तैनात हर सैनिक यहाँ आता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1965तनोट पर दागे गोले मन्दिर के आसपास बिना फटे गिरते हैं; बीएसएफ़ मन्दिर का दायित्व सँभालता है।
- दिसम्बर 1971पास में लोंगेवाला की लड़ाई होती है; मन्दिर में विजय स्तम्भ खड़ा होता है।
तनोट जैसलमेर से अच्छी सड़क पर लगभग 120 किमी उत्तर-पश्चिम में है; यह सीमा क्षेत्र है, इसलिए पहचान-पत्र साथ रखें।




