01पायसम और शतरंज की बाज़ी
मंदिर की कथा कहती है कि एक बार कृष्ण साधु के वेष में चेम्पकश्शेरी के राजा के पास आए और उन्हें शतरंज की चुनौती दी, दाँव चावल का: पहले खाने पर एक दाना, दूसरे पर दो, और इसी तरह दोगुना होते-होते चौंसठवें तक। राजा हार गए और पाया कि उनके भंडार कभी यह चुका नहीं सकते। तब साधु ने कृष्ण रूप में दर्शन दिए और कहा कि ऋण थोड़ा-थोड़ा रोज़ चुकाया जा सकता है, मंदिर में तीर्थयात्रियों को निःशुल्क पायसम देकर, जब तक पूरा न हो जाए। इसीलिए अम्बलप्पुऴा का पाल पायसम, चावल, दूध और शक्कर देर तक उबालकर जो गुलाबी हो जाता है, आज भी प्रतिदिन चढ़ता है।
02गुरुवायूरप्पन की शरण
1754 में मार्तंड वर्मा के समय त्रावणकोर ने चेम्पकश्शेरी को मिला लिया, और मंदिर उस राज्य के बड़े मंदिरों में गिना जाने लगा। 1789 में जब टीपू सुल्तान की सेना मालाबार में घुसी, गुरुवायूर की उत्सव-मूर्ति को सुरक्षा के लिए दक्षिण में अम्बलप्पुऴा लाया गया, और ख़तरा टलने तक वह यहीं रही। ओट्टन तुळ्ळल नृत्य-गायन के रचयिता कवि कुंचन नम्बियार ने यहाँ सेवा की; उनका मिऴावु ढोल मंदिर में रखा है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1754त्रावणकोर चेम्पकश्शेरी को मिला लेता है।
- 1789टीपू सुल्तान के आक्रमण के समय गुरुवायूर की उत्सव-मूर्ति सुरक्षा के लिए यहाँ लाई जाती है।
आलप्पुऴा से राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगभग 14 किमी दक्षिण; पायसम लगभग दोपहर में बाँटा जाता है।




