आज भी खड़ा

श्रीवल्लभ मन्दिर, तिरुवल्ला (तिरुवल्लवाऴ्)

केरल के सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में एक, जहाँ लगभग हर रात भेंट के रूप में कथकली होती है। एक भक्त वृद्धा के लिए भगवान यहाँ युवा ब्रह्मचारी बनकर असुर तुकलासुर को मारने आए।

निर्माण: प्राचीन मन्दिर; चेर काल के तिरुवल्ला ताम्रपत्र इसकी सम्पदा और कर्तव्यों को दर्ज करते हैंस्थान: केरल (पत्तनंतिट्टा ज़िला)देवता: श्रीवल्लभ (कोलप्पिरान्), श्री के प्रिय; तायार् सेल्वत्तिरुक्कोऴुन्दु नाच्चियार्9.37° N, 76.56° E
  1. आळ्वार काल
  2. लगभग 12वीं शताब्दी
चित्र: Ssriram mt · CC BY-SA 4.0

01वल्लभ के ब्रह्मचारी

मन्दिर की कथा शंकरमंगलत्तु अम्मा की है, एक वृद्ध भक्त जो हर एकादशी ब्रह्मचारियों को भोजन कराती थीं। असुर तुकलासुर उन्हें आने नहीं देता था। विष्णु ब्रह्मचारी के रूप में आए, असुर को मारा और श्रीवल्लभ बनकर यहीं रह गए। कहते हैं दुर्वासा और ऋषि खण्डकर्ण को भी यहाँ दर्शन हुए, और मन्दिर मानता है कि दुर्वासा आज भी आधी रात को आते हैं। नम्माळ्वार ने तिरुवाय्मोऴि के एक दशक में और तिरुमंगै आळ्वार ने पेरिय तिरुमोऴि के एक दशक में तिरुवल्लवाऴ् को गाया; बाईस पाशुर गिने जाते हैं।

02ताम्रपत्र, प्राकार और कथकली

तिरुवल्ला ताम्रपत्र, पुरानी मलयालम में चेर काल का एक लम्बा अभिलेख, मन्दिर की भूमि, उसके अन्नसत्र और सेवकों के कर्तव्य गिनाते हैं, और तिरुवल्ला को वैदिक विद्या का बड़ा केन्द्र दिखाते हैं। परिसर ऊँचे ग्रेनाइट प्राकार के भीतर लगभग आठ एकड़ में है, हर दिशा में एक गोपुर। मन्दिर के आगे लगभग पचास फुट ऊँचा काले ग्रेनाइट का गरुड़ स्तम्भ खड़ा है। पूर्व द्वार के सामने कथकली का मंच है, जहाँ भक्त रात भर यह नृत्य-नाट्य भेंट करवाते हैं। 1750 के दशक में मार्ताण्ड वर्मा के समय तिरुवल्ला त्रावणकोर में आया।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. आळ्वार कालनम्माळ्वार और तिरुमंगै आळ्वार तिरुवल्लवाऴ् को गाते हैं।
  2. लगभग 12वीं शताब्दीतिरुवल्ला ताम्रपत्र मन्दिर की भूमि और संस्थाओं को दर्ज करते हैं।
दर्शन और यात्रा

तिरुवल्ला रेलवे स्टेशन से लगभग 2.5 किमी। उस शाम की कथकली भेंट के बारे में कार्यालय से पूछें।