01हाथ से गया दुर्ग
1665 की पुरंदर संधि में शिवाजी को तेईस दुर्ग मुग़लों को सौंपने पड़े। पुणे से थोड़ी दूर दक्षिण-पश्चिम में ऊँची पहाड़ी पर बसा कोंढाणा उनमें था, और वहाँ राजपूत किलेदार उदयभान राठौड़ को मज़बूत सेना के साथ रखा गया। आगरा से लौटकर शिवाजी ने दुर्ग वापस लेने शुरू किए। कोंढाणा सबसे महत्त्वपूर्ण था; वह पुणे और पुरंदर के मार्ग पर नज़र रखता था। मराठा परंपरा कहती है कि बुलावा आया तब तानाजी अपने पुत्र रायबा के विवाह की तैयारी कर रहे थे, और वे तैयारी छोड़कर चल पड़े।
02कड़े पर वह रात
4 फ़रवरी 1670 की रात तानाजी कुछ सौ मावळों को लेकर पश्चिम के खड़े कड़े से ऊपर चढ़े, जहाँ पहरा कम था। पोवाड़ा परंपरा रस्सियों और चढ़ने वाली घोरपड़ की बात कहती है; चढ़ाई तो सचमुच हुई। भीतर पहुँचकर मराठे अँधेरे में आमने-सामने लड़े। तानाजी और उदयभान का सामना हुआ, और दोनों मारे गए। उनके भाई सूर्याजी मालुसरे और वृद्ध शेलार मामा ने मावळों को फिर जुटाया और दुर्ग ले लिया।
समाचार शिवाजी तक पहुँचा तो पोवाड़ा उनके मुख से वह पंक्ति कहलवाता है जो मराठी बच्चे आज भी सीखते हैं: गड आला, पण सिंह गेला।






