01मुरारबाजी का मोर्चा
पुरन्दर और उसका पड़ोसी वज्रगढ़ लगभग 1,350 मीटर ऊँचे एक ही कटक पर खड़े हैं। 1648 में किशोर शिवाजी के सैनिकों ने यहीं फ़तेह ख़ाँ की आदिलशाही सेना को खदेड़ा, यह उनका पहला खुला युद्ध था। उनके ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी का जन्म 14 मई 1657 को इसी दुर्ग में हुआ। 1665 में औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जयसिंह और दिलेर ख़ाँ को बड़ी सेना के साथ भेजा; पहले वज्रगढ़ गिरा, फिर दिलेर ख़ाँ के सैनिक पुरन्दर पर चढ़े। क़िलेदार मुरारबाजी देशपाण्डे कुछ सौ मावळों के साथ बाहर निकले और कटकर गिरने तक लड़े। दुर्ग तब भी नहीं गिरा, पर अपना प्रदेश जलता देख शिवाजी सन्धि के लिए जयसिंह के शिविर गए।
02दो सन्धियाँ
11 जून 1665 को हुई पुरन्दर की सन्धि से शिवाजी ने तेईस दुर्ग छोड़े और आगरा जाना स्वीकार किया; वहाँ उन्हें रोक लिया गया, और अगस्त 1666 में वे वहीं से निकल आए। 1670 में उनके सैनिकों ने पुरन्दर फिर ले लिया। एक शताब्दी बाद इसी दुर्ग के नाम से दूसरी सन्धि हुई, 1 मार्च 1776 को नाना फडणवीस के अधीन पेशवा सरकार और कलकत्ता के अंग्रेज़ों के बीच, जिसने आंग्ल-मराठा युद्ध का पहला दौर रोका। 1818 में अंग्रेज़ों ने दुर्ग लिया। प्राचीर के भीतर पुरन्दरेश्वर महादेव का मन्दिर और मुरारबाजी की प्रतिमा है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1648शिवाजी के सैनिक पुरन्दर में फ़तेह ख़ाँ की आदिलशाही सेना को हराते हैं।
- 14 मई 1657दुर्ग में सम्भाजी का जन्म।
- 1665जयसिंह और दिलेर ख़ाँ पुरन्दर घेरते हैं; रक्षा करते हुए मुरारबाजी देशपाण्डे वीरगति पाते हैं।
- 11 जून 1665पुरन्दर की सन्धि: शिवाजी मुग़लों को तेईस दुर्ग सौंपते हैं।
- 1670मराठे पुरन्दर फिर जीतते हैं।
- 1 मार्च 1776पेशवा सरकार और अंग्रेज़ों के बीच पुरन्दर की दूसरी सन्धि।
- 1818अन्तिम आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेज़ दुर्ग लेते हैं।
सासवड होकर पुणे से लगभग 40 किमी। दुर्ग का कुछ भाग सेना के अधीन है; पहचान-पत्र साथ रखें और जाने से पहले प्रवेश का समय पता कर लें।







