01रायगढ़ से निकलना
राजाराम का जन्म 24 फ़रवरी 1670 को रायगढ़ पर शिवाजी और सोयराबाई के घर हुआ। उन्नीस वर्ष के थे जब मुग़ल सैनिकों ने संगमेश्वर में संभाजी को पकड़ लिया। रायगढ़ के मंत्रियों ने उन्हें संभाजी के शिशु पुत्र शाहू की ओर से राज्य का स्वामी बनाया। ज़ुल्फ़िक़ार ख़ान का घेरा कसता जा रहा था। घेरा पूरा होने से पहले राजाराम निकल गए। नवंबर 1689 में रायगढ़ गिरा; येसूबाई और बालक शाहू मुग़ल कैद में गए, जहाँ शाहू को अठारह वर्ष रहना पड़ा। राजाराम पन्हाळा होते हुए, फिर वेश बदलकर बीजापुर और कर्नाटक के प्रदेश पार करके 1689 के अंत में जिंजी पहुँचे।
02बिना राजधानी का राज्य
जिंजी से उन्होंने पत्रों और भरोसे के बल पर राज चलाया। रामचंद्र पंत अमात्य ‘हुकूमतपनाह’ की पदवी के साथ स्वदेश सँभालते रहे; प्रल्हाद निराजी प्रतिनिधि बनकर राजा के साथ रहे। संताजी घोरपडे और धनाजी जाधव पूरे दक्कन में जहाँ चाहे घूमते, मुग़ल रसद काटते और मैदान में मुग़ल टुकड़ियों को हराते। राजाराम ने खुलकर वतन और इनाम दिए, जिससे लड़ाकू घराने स्वराज्य से बँध गए। 1690 से ज़ुल्फ़िक़ार ख़ान ने जिंजी घेरा; घेरा बरसों खिंचा। 1698 के आरंभ में, दुर्ग गिरने से पहले, राजाराम फिर निकल गए और विशालगढ़, फिर सातारा लौटे।

03सिंहगढ़ पर देहांत
महाराष्ट्र लौटकर वे स्वयं मैदान में उतरे और ख़ानदेश व बरार तक धावे मारे। थकान ने असर दिखाया। वे बीमार पड़े और मार्च 1700 में तीस वर्ष की आयु में सिंहगढ़ पर उनका देहांत हुआ। औरंगज़ेब को दक्कन में लगभग बीस वर्ष हो चुके थे और मराठे अब भी समाप्त नहीं हुए थे। राजाराम अपने पीछे दो शिशु पुत्र छोड़ गए, ताराबाई से शिवाजी और राजसबाई से संभाजी, और एक विधवा जो सात वर्ष और यह युद्ध चलाने वाली थी।







