खंडहर

विशालगढ़

सह्याद्रि का वह दुर्ग जहाँ पन्हाळा के घेरे से निकलकर शिवाजी 13 जुलाई 1660 की रात पहुँचे, जबकि पीछे घोडखिंड में बाजीप्रभु देशपाण्डे दर्रा रोके खड़े थे। बाजीप्रभु और उनके भाई फुलाजी की समाधियाँ इसी दुर्ग पर हैं।

निर्माण: सह्याद्रि का पुराना दुर्ग, खेळणा नाम से ज्ञात; 1659 में शिवाजी ने विशालगढ़ नाम दियास्थान: महाराष्ट्र16.88° N, 73.75° E
  1. लगभग 1470
  2. 1659
  3. 13 जुलाई 1660
  4. 1702
  5. 1707 के बाद
चित्र: आर्या जोशी · CC BY-SA 4.0

01खेळणा

दुर्ग कोंकण की ढलान के किनारे एक लम्बी, समतल चोटी वाली पहाड़ी पर है, जिसके तीन ओर गहरी घाटियाँ हैं। खेळणा नाम से यह दक्कन के सबसे कठिन दुर्गों में गिना जाता था: बहमनी मन्त्री महमूद गावान ने लगभग 1470 में इसके सामने महीनों बिताए। प्रतापगढ़ में अफ़ज़ल ख़ाँ के वध के बाद के सप्ताहों में, 1659 में, शिवाजी ने खेळणा लिया और उसे विशालगढ़, अर्थात चौड़ा दुर्ग, नाम दिया।

02घोडखिंड की रात

1660 में सिद्दी जौहर की आदिलशाही सेना ने शिवाजी को महीनों पन्हाळा में घेरे रखा। जुलाई की एक मूसलाधार रात वे पालकी में थोड़े-से मावळों के साथ निकले और लगभग 60 किमी दूर विशालगढ़ की ओर दौड़े। सिद्दी मसूद के घुड़सवार पीछे लगे। घोडखिंड के सँकरे दर्रे में बाजीप्रभु देशपाण्डे कुछ सौ सैनिकों के साथ पलटकर घण्टों डटे रहे। बखरें कहती हैं कि वे तब तक नहीं गिरे जब तक विशालगढ़ से तोपों की वह आवाज़ नहीं सुनी जो बताती थी कि राजा सुरक्षित पहुँच गए। तभी से उस दर्रे को पावनखिंड कहते हैं। 1702 में औरंगज़ेब ने दुर्ग लेकर उसका नाम सखरलना रखा; उसकी मृत्यु के बाद मराठों ने इसे लौटा लिया।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. लगभग 1470बहमनी मन्त्री महमूद गावान लम्बे घेरे के बाद खेळणा लेता है।
  2. 1659शिवाजी खेळणा लेकर उसका नाम विशालगढ़ रखते हैं।
  3. 13 जुलाई 1660शिवाजी पन्हाळा से विशालगढ़ पहुँचते हैं; घोडखिंड रोकते हुए बाजीप्रभु देशपाण्डे वीरगति पाते हैं।
  4. 1702औरंगज़ेब घेरा डालकर दुर्ग लेता है और उसे सखरलना नाम देता है।
  5. 1707 के बादमराठे विशालगढ़ फिर लेते हैं।
दर्शन और यात्रा

कोल्हापुर से लगभग 76 किमी पश्चिम। उस रात की स्मृति में बहुत लोग वर्षा ऋतु में पन्हाळा–पावनखिंड–विशालगढ़ पदयात्रा करते हैं।