औरंगज़ेब मराठों को जीते बिना 1707 में दक्कन में ही मर गया, और मराठे इस युद्ध से और सबल होकर निकले।
01संभाजी महाराज
संभाजी महाराज एक साथ हर मोर्चे पर लड़े: मुग़ल, जंजीरा के सिद्दी और गोवा के पुर्तगाली। 1686 में बीजापुर और 1687 में गोलकुंडा औरंगज़ेब के हाथ आए, और मराठे अकेले रह गए। फ़रवरी 1689 में विश्वासघात से संगमेश्वर में संभाजी महाराज पकड़े गए। उन्होंने हर माँग ठुकरा दी, और कई दिनों की यातना के बाद मार्च 1689 में भीमा तट पर तुलापुर में उनका वध किया गया। मआसिर-ए-आलमगीरी उनके पकड़े जाने का उल्लेख करती है। उसी वर्ष रायगढ़ भी गिरा।
02बिना राजधानी का युद्ध
राजाराम महाराज सुदूर दक्षिण में जिंजी निकल गए, और युद्ध पूरे प्रायद्वीप में फैल गया। संताजी घोरपडे और धनाजी जाधव की तेज़ घुड़सवार सेनाओं ने मुग़ल रसद काटी और खुले में मुग़ल टुकड़ियों को हराया। 1700 में राजाराम महाराज के देहांत के बाद उनकी विधवा ताराबाई ने अपने छोटे पुत्र के नाम से युद्ध चलाया। औरंगज़ेब ने अंतिम वर्ष पहाड़ी दुर्गों की घेराबंदी में बिताए; एक लेता तो दूसरा फिर हाथ से निकल जाता।

03अहमदनगर, 1707
3 मार्च 1707 को अठासी वर्ष की आयु में औरंगज़ेब अहमदनगर में मरा। उसका ख़ज़ाना ख़ाली था और सेना थकी हुई। एक पीढ़ी के भीतर मराठा घुड़सवार दिल्ली, मालवा और बंगाल तक पहुँच रहे थे।
इस युद्ध ने मुग़ल साम्राज्य की शक्ति तोड़ दी और अगली शताब्दी में मराठों को भारत की प्रमुख शक्ति बना दिया।


