लोग कहते हैं

“अकबर ने सभी धर्मों से समान व्यवहार किया और कभी धर्म के नाम पर युद्ध नहीं किया।”

अर्धसत्य
तथ्य

1560 के दशक से अकबर ने तीर्थ-कर और जज़िया हटाए और बाद में हिंदू सामंतों को बड़े मंदिर बनाने दिए। पर 1568 में चित्तौड़ के बाद उसका अपना विजय-पत्र इस युद्ध को काफ़िरों के विरुद्ध जिहाद कहता है, और वहाँ के नरसंहार को उसका अपना इतिहासकार दर्ज करता है।

प्रमाण

  1. अबुल फ़ज़ल का ‘अकबरनामा’ तीर्थ-कर (1563) और जज़िया (1564) समाप्त करने को दर्ज करता है।
  2. मार्च 1568 में अजमेर से जारी और ‘मुंशआत-ए-नमकीन’ में सुरक्षित चित्तौड़ का फ़तहनामा घेराबंदी को जिहाद बताता है, क़ुरान की जिहाद वाली आयतें उद्धृत करता है और रक्षकों को काफ़िर कहता है।
  3. ‘अकबरनामा’ चित्तौड़ के पतन के बाद मारे गए लोगों की संख्या लगभग 30,000 बताता है।
  4. राजा मानसिंह ने अकबर के शासनकाल में 1590 में वृन्दावन का गोविंददेव मंदिर बनवाया।

01एक ही अभिलेख में दो अकबर

दोनों चित्र मुग़ल काग़ज़ों से आते हैं, और दोनों अलग-अलग समय पर सच हैं। 1567–68 में चित्तौड़ पर टूटने वाला युवा अकबर अपने युग के किसी भी विजेता सुल्तान की भाषा में लिखता था। प्रौढ़ अकबर ने इबादतख़ाने में पंडितों, जैन मुनियों और जेसुइट पादरियों से शास्त्रार्थ किया, राजपूत राजकुमारियों से धर्म बदलवाए बिना विवाह किए, और राजपूत राजाओं को अपने साम्राज्य का स्तंभ बनाया। 1582 का उसका ‘दीन-ए-इलाही’ सम्राट के आसपास दरबारियों का एक छोटा घेरा था, जिसके नामित सदस्यों में बीरबल अकेले हिंदू थे, और वह उसी के साथ समाप्त हो गया।

02साथ में मेवाड़ भी पढ़िए

अकबर को परखने का सबसे न्यायसंगत तरीक़ा दीवार के दोनों ओर से देखना है। 1568 में चित्तौड़ के भीतर जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया क़िले की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और स्त्रियों ने जौहर किया। महाराणा प्रताप ने जीवन भर अकबर की शर्तें ठुकराईं, 1576 में हल्दीघाटी में लड़े, और 1597 में अपनी मृत्यु तक अधिकांश मेवाड़ वापस ले लिया। कोई शासक नीति में सहिष्णु और विजय में निर्मम, दोनों एक साथ हो सकता है। अकबर दोनों था।

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चित्तौड़गढ़ का तीसरा साका

राणा उदयसिंह पहाड़ों में चले गए और चित्तौड़ जयमल और पत्ता को सौंप दिया। अकबर ने स्वयं चार महीने तक सुरंगों और ढकी हुई खाइयों से घेरा डाला।

अक्टूबर 1567 – 23 फ़रवरी 1568 ई.

महाराणा प्रताप

प्रताप सिंह ने मुग़ल दरबार के हर दूत को लौटाया, 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मानसिंह की सेना से लड़े, और अगले बीस वर्ष पहाड़ों से मेवाड़ वापस जीतने में लगाए; 1597 में चावंड में उनके निधन तक केवल चित्तौड़ और मांडलगढ़ मुग़लों के पास बचे थे।

1540–1597 ई.; शासन 1572–1597

हल्दीघाटी का युद्ध

अकबर ने महाराणा प्रताप को झुकाने के लिए मानसिंह को बड़ी सेना के साथ भेजा। हल्दी जैसी पीली मिट्टी वाले हल्दीघाटी दर्रे के मुहाने पर दोनों का सामना हुआ।

जून 1576 ई. (अधिकांश गणना से 18 जून)

चित्तौड़गढ़

मेवाड़ का पहाड़ी दुर्ग, मैदान से 180 मीटर ऊँचा और लगभग 13 कि.मी. के घेरे में। तीन बार घेरा गया और जीता गया, 1303, 1535 और 1568 में, और हर बार स्त्रियों ने जौहर चुना। विजय स्तम्भ आज भी उसके ऊपर खड़ा है।

अबुल फ़ज़ल की आईन-ए-अकबरी

अकबर के साम्राज्य का गज़ेटियर: उसके सूबे, राजस्व, सेना, टकसालें, भाव और लोग।

लगभग 1598 ई. में पूर्ण