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आनुवंशिकी · पिछले 8,000 वर्षों के नमूने; 2019 में प्रकाशित

दक्षिण और मध्य एशिया का प्राचीन डीएनए (नरसिम्हन आदि, 2019)

प्राप्ति
मध्य एशिया, ईरान और दक्षिण एशिया के सुदूर उत्तर (स्वात घाटी सहित) की समाधियाँ; हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से संचालित एक अन्तरराष्ट्रीय दल का अध्ययन
अब कहाँ
‘साइंस’ पत्रिका में 6 सितम्बर 2019 को प्रकाशित, राखीगढ़ी जीनोम वाले सप्ताह में ही

इस क्षेत्र का सबसे बड़ा प्राचीन-डीएनए अध्ययन: 523 व्यक्ति, जिनसे यह शोधपत्र दक्षिण एशियाई वंश की मुख्य रेखाएँ खींचता है।

यह क्या कहता है

आज के दक्षिण एशियाई लोगों की वंश-परम्परा का मुख्य स्रोत एक पुरानी शृंखला है, जिसके एक छोर पर ईरान के आरम्भिक शिकारी-संग्राहकों से सम्बन्धित लोग हैं और दूसरे पर दक्षिण-पूर्व एशिया के शिकारी-संग्राहकों से दूर का सम्बन्ध रखने वाली वह धारा, जिसे आनुवंशिकी के विद्वान ‘प्राचीन पूर्वज दक्षिण भारतीय’ कहते हैं; ईरान और तुर्कमेनिस्तान के स्थलों पर मिले कुछ अलग व्यक्ति, जिन्हें सिन्धु-जगत से आए लोग माना गया, यही मेल लिए थे। स्टेपी से जुड़ा अंश दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. के पूर्वार्ध में स्वात घाटी और उससे दक्षिण पहुँचा, और आज कुछ समूहों में 30 प्रतिशत तक है। लेखक प्रस्ताव रखते हैं कि यही आवागमन भारोपीय भाषाएँ लाया होगा; यह उनका प्रस्ताव है और इस पर बहस जारी है।

यह क्या सिद्ध करता है

राखीगढ़ी जीनोम के साथ पढ़ने पर यह दिखाता है कि बाद के भारतीयों की वंश-परम्परा का सबसे बड़ा अकेला स्रोत हड़प्पा की जनसंख्या थी; स्टेपी-धारा बाद में और आंशिक रूप में आई। कोई प्राचीन नमूना औपनिवेशिक काल की उस तस्वीर का समर्थन नहीं करता जिसमें कोई विजेता नस्ल भारत के लोगों को हटा देती है।

इनका प्रमाण