01मानदेव का स्तम्भ, 464
काठमाण्डू के पूर्व चांगु की पहाड़ी पर विष्णु मन्दिर के सामने पत्थर का एक स्तम्भ है, संवत् 386, अर्थात् 464 ई. का। राजा मानदेव प्रथम बताते हैं कि पिता के देहान्त पर उनकी माता राज्यवती सहगमन करना चाहती थीं, उन्होंने विनती करके माता को रोका, और फिर पूर्व और पश्चिम में अभियान करके पहाड़ी सरदारों को अधीन किया। यह नेपाल का सबसे पुराना तिथियुक्त शिलालेख है। मन्दिर के सामने घुटने टेके गरुड़ उसी युग के हैं।
02अंशुवर्मा
ठकुरी कुल के अंशुवर्मा लिच्छवि राजा शिवदेव प्रथम के मन्त्री के रूप में उभरे और लगभग 605 से 621 तक अपने नाम से राज किया। उनके शिलालेख पशुपति को प्रणाम से आरम्भ होते हैं। उन्होंने कैलाशकूट भवन बनवाया, जिसकी भव्यता की चर्चा चीनी यात्री ह्वेनसांग तक पहुँची। ह्वेनसांग ने यह भी लिखा कि नेपाल के राजा विद्वान थे और उन्होंने व्याकरण पर ग्रन्थ लिखा था।

03पशुपति की भूमि
733 में राजा जयदेव द्वितीय ने पशुपतिनाथ में शिलालेख लगवाया जो लिच्छवि वंश को वैशाली के कुल तक ले जाता है और भगवान को चढ़ाए चाँदी के कमल का उल्लेख करता है। लिच्छवि राजाओं ने शैव और वैष्णव मन्दिरों और बौद्ध विहारों, सबको भूमि दी, और घाटी की बहुत-सी पत्थर की मूर्तियाँ, जैसे तिलगंगा के विष्णु विक्रान्त और बुढ़ानीलकण्ठ के शयन विष्णु, उन्हीं के समय की हैं। नौवीं शताब्दी में यह वंश धूमिल हो गया; नेवारों द्वारा आज भी प्रयुक्त नेपाल संवत् 879 से आरम्भ होता है।
शासक
- 1मानदेव प्रथमचांगु नारायण स्तम्भ, 464c. 464–505
- 2शिवदेव प्रथमc. 590–604
- 3अंशुवर्माकैलाशकूट भवन बनवायाc. 605–621
- 4नरेन्द्रदेवतिब्बत और तांग चीन से सम्बन्धc. 643–679
- 5जयदेव द्वितीयपशुपतिनाथ वंशावली शिलालेख, 733c. 713–733
उनकी विरासत
- 464 का चांगु नारायण स्तम्भ, नेपाल का सबसे पुराना तिथियुक्त शिलालेख
- घाटी भर में लगभग 200 संस्कृत शिलालेख
- चांगु के गरुड़ और बुढ़ानीलकण्ठ के विष्णु
- पाटन और काठमाण्डू में आज भी बहती पत्थर की धाराएँ (हिटी)


